पतंजलि योग समिति के सदस्यों के लिए गीता ज्ञान पर हुई दो दिवसीय विशेष प्रवचनमाला

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Day-1 https://youtu.be/BN4YO-FXqIw

Day-2 https://youtu.be/-m94gpZ1MTw

सादर प्रकाशनार्थ

प्रेस विज्ञप्ति

स्वयं के काउंसिलिंग करने का शास्त्र है गीता – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

ज्ञान युक्त भक्ति अर्थात् राजयोग है श्रेष्ठ भक्ति

पतंजलि योग समिति के सदस्यों के लिए गीता ज्ञान पर हुई दो दिवसीय विशेष प्रवचनमाला

ज्ञानयोग, कर्मयोग, स्थितप्रज्ञ, नवधा भक्ति, भक्त के प्रकार और भक्ति योग पर हुई आध्यात्मिक विवेचना

 

बिलासपुर टिकरापाराः- श्रीमद्भागवत् गीता केवल हिन्दूओं का शास्त्र नहीं अपितु समस्त मानव जाति का शास्त्र है। इसलिए दुनिया में एकमात्र यही शास्त्र है जिसका कि सबसे अधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। जीवन के संघर्षों में जीत प्राप्त करने के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शन या आज की भाषा में कहें तो स्वयं की काउंसिलिंग करने का यह परमशास्त्र है। इसके लिए अर्जुन के स्थान पर स्वयं को रखें और देखें कि भगवान हमसे बात कर रहे हैं, हमें समझा रहे हैं।
उक्त बातें पतंजलि योग समिति के राज्य स्तरीय योग प्रशिक्षण में गीता के विभिन्न विषयों पर संबोधित करते हुए अतिथि वक्ता के रूप में टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही।
पांच प्रतिशत सकारात्मक विचार वालों से होगा विश्व का परिवर्तन…
भगवान से जिनकी सच्ची प्रीत है वे पाण्डव हैं और अधर्म पक्ष के वाचक हैं कौरव। राजा धृतराष्ट्र सत्ता के लोभ के प्रतीक हैं जबकि कौरवों के नाम की शुरूआत ही ‘दु’ अक्षर से है। धन का दुरूपयोग करने वाला दुर्योधन, अनुशासन नाम की चीज नहीं वो है दुस्साशन। पाण्डव पांच थे फिर भी उनकी विजय हुई। इसलिए श्रेष्ठ दुनिया की स्थापना करने के लिए भी दुनिया में कम से कम पांच प्रतिशत सकारात्मक विचार वाले व भगवान से प्रीत रखने वाले लोगों की जरूरत है। और जो परिवर्तन का कारण बनते हैं वे लोग ही नेतृत्व करते हैं। क्योंकि उन्हें सभी की दुआओं का व परमात्म बल साथ देता है।
अच्छे मार्ग में अवरोध का आना निश्चित…
कई लोग परिवार, समाज व देश के कल्याण के कार्य में लगे रहते हैं लेकिन जब उनके मार्ग में रूकावट आती है, विरोध होता है, तो वे मायूस हो जाते हैं और प्रश्न करते हैं कि मेरे साथ ऐसा क्यों, जबकि मैंने किसी का बुरा नहीं चाहा। इस पर दीदी ने कहा कि अच्छे मार्ग में अवरोध तो आते ही हैं और यदि किसी प्रकार की रूकावट नहीं है तो यह समझिए कि आपका लक्ष्य छोटा है, महान नहीं है।
अंधकार में प्रकाश की किरण है गीता…
जीवन में थकने हारने के बाद भी हम गीता की शरण में जाते हैं तो इस अंधकार में गीताज्ञान ही प्रकाश की किरण है। भगवानुवाच भी है कि ‘तुम मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सर्व पापों से मुक्त कर दूंगा’। शरण में जाना अर्थात् मन-बुद्धि से भगवान की श्रीमत पर समर्पित होना। गीता से आत्मज्ञान, परमात्म ज्ञान और कर्मों की गति का ज्ञान प्राप्त होता है। जिससे हमारा मोह नष्ट होकर आत्मिक प्रेम का भाव जागृत होता है।
मनोबल के उदाहरण हैं स्वामी विवेकानंद…
दीदी ने बतलाया कि जब शिकागो में गीता शास्त्र को नीचे रख कर अपमानित किया गया तो शांत मन व श्रेष्ठ मनोबल का उदाहरण देते हुए स्वामी विवेकानंद ने उस अपमान को सर्वश्रेष्ठ सम्मान में परिवर्तित कर दिया। जो गीता से प्राप्त आत्मज्ञान का ही कमाल था क्योंकि हारा हुआ जीत सकता है लेकिन मन से हारा हुआ कभी नहीं जीत सकता। स्वामी विवेकानंद के पास भी मनोबल था। जब हमारे अंदर का युद्ध चलता है तब गीता ज्ञान की सार्थकता महसूस होती है। आज जीवन में सबकुछ हो लेकिन शान्ति न हो तो जीवन; जीवन नहीं लगता क्योंकि शान्ति, सुख, प्रेम स्वधर्म है और अशांति, क्रोध, काम, लोभ आदि परधर्म हैं जो दुखों के कारण हैं।
सन्यासयोग से ज्ञानयोग व कर्मयोग श्रेष्ठ…
कर्म तो किसी भी हालत में सभी करते ही हैं क्योंकि खाना, सोना, उठना, बैठना भी कर्म है। कर्मों का सन्यास तो किया ही नहीं जा सकता। यदि कर्म में ज्ञान शामिल हो जाये अर्थात् ईश्वर की याद शामिल हो जाए तो विकर्म समाप्त होकर श्रेष्ठ कर्म होने लगते हैं और यही ज्ञानयोग है। वास्तव में सन्यास तो कर्मों से नहीं अपितु विकारों व बुराई से कही गई है।
कामना में विघ्न से क्रोध उत्पन्न होता है और बुद्धि नष्ट हो जाती है…
दीदी ने गीता के दूसरे अध्याय के 62वें व 63वें श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा कि विषयों में आसक्ति से कामना की उत्पत्ति और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध की उत्पत्ति, क्रोध से मूढ़भाव जिससे स्मृति भ्रमित और ज्ञान का नाश हो जाता है जिससे मनुष्य का पतन अर्थात् सर्वनाश हो जाता है ।
स्थिरबुद्धि बनने के लिए विषय-वासनाओं का त्याग जरूरी…
दीदी ने कहा कि अक्सर हम किसी कार्य के लिए निर्णय नहीं ले पाते, क्योंकि हमारा मन एकाग्र नहीं होता और पांच विकारों और विषयों के चिंतन से हमारी बुद्धि की निर्णय शक्ति नष्ट हो जाती है। जिस प्रकार तेज हवा पानी को बहाकर ले जाती है उसी प्रकार कर्मेन्द्रियों के वशीभूत व्यक्ति के मन का हरण हो जाता है। इसलिए स्थिरबुद्धि बनने के लिए राग-द्वेष, इन्द्रियों के आकर्षण से और किसी भी व्यक्ति, वस्तु व वैभव की आसक्ति से मुक्त बनना होगा। साधनों का उपयोग जरूर करें लेकिन उस पर निर्भर न बनें और कोशिश करें कि वो चेहरा सदा मुस्कुराता हुआ रहे जिसे आप रोज आइने में देखते हैं क्योंकि आपके आंसुओं से दुनिया को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता।
ज्ञानी भक्त भगवान को सबसे अधिक प्रिय हैं…
नवधा भक्ति के बारे में बताते हुए आपने कहा कि श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ये नवधा भक्ति के नौ अंग हैं। चार प्रकार के भक्तों के बारे में आपने कहा कि आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी सभी भगवान का भजन करते हैं लेकिन इनमें सबसे निम्न श्रेणी के भक्त अर्थार्थी हैं जो मतलब से भगवान को याद करते हैं जबकि ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है और वह भगवान को और भगवान उसको सबसे प्रिय है क्योंकि वह शुद्ध भक्ति में लगा रहता है और ज्ञान के साथ भक्ति करता है और ज्ञान के आधार पर भक्ति करना ही राजयोग है।
इसके अतिरिक्त इन दो दिनों में दीदी ने अन्य गहरे तथ्यों पर प्रकाश डाला। जूम मीटिंग पर आयोजित इस कार्यक्रम में पतंजलि के केन्द्रीय प्रभारी भ्राता संजय अग्रवाल, राज्य प्रभारी डॉ. मनोज पाणीग्रही, सह-राज्य प्रभारी छबीराम साहू, भारत स्वाभिमान न्यास के प्रांतीय कार्यालय प्रभारी डी.एल. पटेल आदि पदाधिकारी सहित लगभग लगभग सौ योग प्रशिक्षक शामिल रहे। सभी ने इस आध्यात्मिक विवेचना को लाइव चैट के माध्यम से खूब सराहा। कल 5 जून को पर्यावरण दिवस पर पदाधिकारियों ने अपने विचार भी रखे। व सभी को अधिक ऑक्सीजन देने वाले व औषधीय पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया।