ब्रह्माकुमारी संस्थान की प्रथम मुख्य प्रषासिका मातेष्वरी जी की 53वीं पुण्यतिथि मनायी गई

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सादर प्रकाषनार्थः-
प्रेस-विज्ञप्ति
तपस्या की प्रतिमूर्ति थीं मातेष्वरी जी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
पवित्रता, एकनामी व इकॉनॉमी मम्मा की चारित्रिक विषेषता
ब्रह्माकुमारी संस्थान की प्रथम मुख्य प्रषासिका मातेष्वरी जी की 53वीं पुण्यतिथि मनायी गई
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बिलासपुर टिकरापारा, 24 जूनः- प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईष्वरीय विष्व विद्यालय की प्रथम मुख्य प्रषासिका मातेष्वरी जगदम्बा सरस्वती जी की 53वीं पुण्यतिथि मनायी गई। आज ही के दिन संपूर्ण स्वरूप को प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने 24 जून 1965 को अपने नष्वर शरीर का त्याग किया था। आज के दिन संस्थान के सभी सेवाकेन्द्रों में विषेष आयोजन किये गए हैं। टिकरापारा सेवाकेन्द्र में ब्रह्माकुमारी बहनों एवं संस्था के सदस्यों के द्वारा मम्मा की षिक्षाओं को धारण करने का संकल्प लेते हुए उन्हें मौन श्रद्धांजलि दी गई।
ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने मातेष्वरी जी के चरित्र पर प्रकाष डालते हुए कहा कि मातेष्वरी जी के अंदर छोटे, बड़े, वृद्ध सभी के प्रति मातृत्व की भावना भरपूर थी सभी ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियां उन्हें प्यार से मम्मा कहकर संबोधित करते थे। संस्था के साकार संस्थापक पिताश्री ब्रह्माबाबा के साथ यज्ञ (संस्था) की स्थापना के निमित्त रह प्रथम मुख्य प्रषासिका बनी। मम्मा की मुख्य विषेषताएं थी कि वे परमात्मापिता एवं उनके श्रीमत के प्रति संपूर्ण निष्चयबुद्धि थे, एकनामी अर्थात् एक भगवान की याद की तपस्या उनके जीवन में स्पष्ट दिखाई देता, वे ब्रह्ममुहूर्त में प्रातः 2 बजे से ही उठकर तपस्या में लग जाती थीं। धन के साथ-साथ संकल्प एवं बोल की भी इकॉनॉमी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उनमें ज्ञान की पराकाष्ठा गहराई तक थी, प्रतिदिन सत्संग सुनने के पश्चात् मम्मा तुरंत ही उसका विचार सागर मंथन कर सरल शब्दों में साधकों के आगे स्पष्ट करते थे जिन्हें वे अपने जीवन में सहजता से आत्मसात कर सकें। ज्ञान सुनाने के पश्चात् मम्मा ऐसा मौन में तपस्यारत हो जातीं कि जैसे वे इस साकारी दुनिया में हैं ही नहीं। उनका ध्यान निजी पुरूषार्थ पर बहुत रहता था। उनके मुख से सदा यही बोल निकलते कि जैसा कर्म हम करेंगे, हमें देख सब करेंगे। उनकी यह भी धारणा थी कि हर घड़ी अंतिम घड़ी समझकर पुरूषार्थ करते रहें और कर्म करते स्मृति रहे कि हुकुमी हुकुम चला रहा है।
कभी ख्याल न आए कि यह षिक्षा क्यों मिली
मम्मा कहते थे कि कभी कोई भी षिक्षा मिले तो उसे संभाल कर रखना। कभी यह ख्याल न आए कि यह षिक्षा मुझे क्यों मिली, मेरी भूल तो थी नहीं। षिक्षा बड़ी काम की होती है, समय पर बहुत काम आती है। यह न समझें कि यह छोटा मुझे सिखाने वाला कौन होता है, इस प्रकार मम्मा ने सभी के अंदर सीखने की भावना उत्पन्न की।
कार्यक्रम के अंत में सभी ने मातेष्वरी जी के निमित्त परमात्मा को भोग स्वीकार कराया तत्पष्चात् सभी ने मौन श्रद्धांजलि देकर प्रसाद ग्रहण किया।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)