नैतिक षिक्षा का चौथा सप्ताह, खालसा, नेषनल व गुरूनानक स्कूल के बच्चे हुए शामिल

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प्रेस-विज्ञप्ति
माता-पिता के दिल में अपना स्थान बनाएं बच्चे- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
नैतिक षिक्षा का चौथा सप्ताह, खालसा, नेषनल व गुरूनानक स्कूल के बच्चे हुए शामिल
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बिलासपुर, टिकरापारा, 22 जुलाईः किषोर अवस्था या टीन एज की अवस्था हमारे जीवन के परिवर्तन का मोड़ है। इस उम्र में हमारे भीतर हार्मोनल चेन्जेस होते हैं जो मन में विभिन्न भाव उत्पन्न करते हैं। हम किसी के शारीरिक रूप या गुणों से आकर्षित हो जाते हैं और समझ लेते हैं कि यही प्यार है। लेकिन यह जान लेना बहुत जरूरी है कि इस उम्र में यह केवल शारीरिक आकर्षण ही है जो हमारी बुद्धि में भटकाव ले आता है, हम पढ़ाई और संस्कारों से दूर हो जाते हैं, फिर हमारा मन किसी भी चीज में नहीं लगता और उसके बाद जब जीवन की सत्यता हमें समझ आती है तो हमें ऐसा लगता है कि काष! हमने उस समय अच्छे से पढ़ाई की होती, कुछ बन पाते, अच्छे पद पर रहते लेकिन आज हमारा जीवन साधारण रह गया कि हजार रूपये कमाने में भी बहुत मेहनत लग रही है क्योंकि आज के आधार पर ही आपका आने वाला कल बनने वाला है।
उक्त बातें खालसा, गुरूनानक एवं नेषनल स्कूल के बच्चों के लिए आयोजित नैतिक षिक्षा की क्लास के चौथे सप्ताह में ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र की प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। बच्चों की काउंसिलिंग करते हुए दीदी ने कहा कि जिसे हम प्यार समझते हैं वह केवल भटकाव ही है। इसकी गहराई में जाने से हम डिप्रेषन में चले जाते हैं। ऐसे समय में अपने माता-पिता या षिक्षक से खुले दिल से चर्चा करें, डरें नहीं। यह उम्र पढ़ाई की है। यदि फैषन या बाहरी आकर्षण में बुद्धि भटक रही है, इससे स्वयं को बचाएं क्योंकि माधुरी, ऐष्वर्या या शाहरूख तो एकाध ही बन पाते हैं लेकिन इनके पीछे अनेक जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं। जीवन का यही समय ऐसा है जब दिषा सही है तो स्वामी विवेकानंद और गलत रहा तो ओसामा बिन लादेन तक बन जाते हैं। साथ ही दीदी ने टीचर्स एवं पैरेन्ट्स के लिए भी यह संदेष दिया कि जब बच्चे इस तरह की बातें आपसे शेयर करें तो आप कृपया उनसे दोस्ताना व्यवहार करें, उन्हें हल्का करें और सही मार्गदर्शन करें। इस उम्र में बच्चे आइने के सामने बार-बार जाते हैं, दीदी जी ने इस संस्कार को सकारात्मक मोड़ देते हुए कहा कि जो लेसन कठिन लगता हो या कोई आंसर याद न हो उसके नोट्स तैयार कीजिये और पॉइन्टवाइस बड़े अक्षरों में कागज में लिखकर उसे आइने के पास लगा दें। जब भी आप आइने के पास जाएं इन्हें पढ़कर रिवाइज़ कर लिया करें। बार-बार पढ़ने से यह हमें याद हो जाएगा। अपने नोट्स खुद तैयार करें, किसी चीज के लिए माता-पिता से जिद्द न करें, उन्हें जानकारी जरूर दें कि आपको किस चीज की जरूरत है। यदि वह चीज आवष्यक होगी तो वे खुद ही उसकी व्यवस्था में लग जाएंगे। माता-पिता के दिल में स्थान बनाइए, उनकी दुआएं लीजिये तो हर राह खुलती जाएगी। वे थकते हैं तो उनके हाथ-पैर दबा दिया करें।
छोटे, बड़े सभी बच्चों को कुछ महत्वपूर्ण बातें बताते हुए आपने कहा कि पढ़ाई के समय नो टीवी, नो मोबाइल, नो लड़ाई-झगड़ा। मोबाइल और टीवी तो टीबी की बीमारी की तरह हैं। खेलने का समय जरूर निर्धारित करें। रोज रात को जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठकर हाथ-मुंह धोकर कुछ पल ध्यान करें, थोड़ा आसन-प्राणायाम, पांच मिनट कपालभाति, पांच मिनट अनुलोम-विलोम करके एक घण्टे पढ़ाई करें, फिर स्नान करके माता-पिता, दादा-दादी या अपने बड़ों के पैर छूकर ही स्कूल जाएं क्योंकि स्कूल एक मंदिर की तरह है और स्नान करके स्कूल जाने से हम ताजगी से भरे रहेंगे और अंतिम पीरियड तक हमें सुस्ती, आलस्य या नींद नहीं आयेगी। अंत में दीदी ने सभी बच्चों को मेडिटेषन के माध्यम से उक्त बातों को धारण करने के लिए संकल्पित कराया। कार्यक्रम में बच्चों के अलावा उनके षिक्षक-षिक्षिकाएं उपस्थित थे।