ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में मनाया गया गुरू पूर्णिमा का पर्व

सादर प्रकाषनार्थः-
प्रेस-विज्ञप्ति
सत्गुरू का संग सभी बुराईयां छुड़ा देता है – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में मनाया गया गुरू पूर्णिमा का पर्व
बिलासपुर, टिकरापारा, 26 जुलाईः सन्यासियों, गुरूओं का इस विष्व में बहुत महत्व है क्योंकि इनकी पवित्रता के कारण ही यह धरती थमी हुई है। यदि ऐसे पवित्र व्यक्ति संसार में न होते तो अपवित्रता का कर्म अपने चरम पर पहुंच जाता और सारी दुनिया विकारों की आग में कब की जल चुकी होती। जिस प्रकार सुर के बिना तान नहीं मिल सकता उसी प्रकार गुरू के बिना ज्ञान नहीं मिल सकता।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में गुरू पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। दीदी ने अपने जीवन में विभिन्न गुरूओं के सानिध्य से सीखी गई षिक्षाओं को साझा करते हुए कहा कि षिक्षाएं जीवन के किसी न किसी मोड़ पर काम में जरूर आती है। यदि मन में तीव्र इच्छा हो तो गुरूओं की आज्ञाओं को पालन करते-करते एक समय आता है जब हमारी भक्ति पूरी हो जाती है और भक्ति की पूर्णता के बाद सत्य ज्ञान की प्राप्ति होती है जिसमें हमें परमसत्गुरू परमात्मा की सत्य पहचान मिलती है। और जब सत्गुरू का संग प्राप्त होता है तो धीरे-धीरे करके हमारी सभी बुराईयां समाप्त हो जाती हैं।
भ्राता सम्पादक महोदय,
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बिलासपुर (छ.ग.)

नैतिक षिक्षा का चौथा सप्ताह, खालसा, नेषनल व गुरूनानक स्कूल के बच्चे हुए शामिल

प्रेस-विज्ञप्ति
माता-पिता के दिल में अपना स्थान बनाएं बच्चे- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
नैतिक षिक्षा का चौथा सप्ताह, खालसा, नेषनल व गुरूनानक स्कूल के बच्चे हुए शामिल
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बिलासपुर, टिकरापारा, 22 जुलाईः किषोर अवस्था या टीन एज की अवस्था हमारे जीवन के परिवर्तन का मोड़ है। इस उम्र में हमारे भीतर हार्मोनल चेन्जेस होते हैं जो मन में विभिन्न भाव उत्पन्न करते हैं। हम किसी के शारीरिक रूप या गुणों से आकर्षित हो जाते हैं और समझ लेते हैं कि यही प्यार है। लेकिन यह जान लेना बहुत जरूरी है कि इस उम्र में यह केवल शारीरिक आकर्षण ही है जो हमारी बुद्धि में भटकाव ले आता है, हम पढ़ाई और संस्कारों से दूर हो जाते हैं, फिर हमारा मन किसी भी चीज में नहीं लगता और उसके बाद जब जीवन की सत्यता हमें समझ आती है तो हमें ऐसा लगता है कि काष! हमने उस समय अच्छे से पढ़ाई की होती, कुछ बन पाते, अच्छे पद पर रहते लेकिन आज हमारा जीवन साधारण रह गया कि हजार रूपये कमाने में भी बहुत मेहनत लग रही है क्योंकि आज के आधार पर ही आपका आने वाला कल बनने वाला है।
उक्त बातें खालसा, गुरूनानक एवं नेषनल स्कूल के बच्चों के लिए आयोजित नैतिक षिक्षा की क्लास के चौथे सप्ताह में ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र की प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। बच्चों की काउंसिलिंग करते हुए दीदी ने कहा कि जिसे हम प्यार समझते हैं वह केवल भटकाव ही है। इसकी गहराई में जाने से हम डिप्रेषन में चले जाते हैं। ऐसे समय में अपने माता-पिता या षिक्षक से खुले दिल से चर्चा करें, डरें नहीं। यह उम्र पढ़ाई की है। यदि फैषन या बाहरी आकर्षण में बुद्धि भटक रही है, इससे स्वयं को बचाएं क्योंकि माधुरी, ऐष्वर्या या शाहरूख तो एकाध ही बन पाते हैं लेकिन इनके पीछे अनेक जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं। जीवन का यही समय ऐसा है जब दिषा सही है तो स्वामी विवेकानंद और गलत रहा तो ओसामा बिन लादेन तक बन जाते हैं। साथ ही दीदी ने टीचर्स एवं पैरेन्ट्स के लिए भी यह संदेष दिया कि जब बच्चे इस तरह की बातें आपसे शेयर करें तो आप कृपया उनसे दोस्ताना व्यवहार करें, उन्हें हल्का करें और सही मार्गदर्शन करें। इस उम्र में बच्चे आइने के सामने बार-बार जाते हैं, दीदी जी ने इस संस्कार को सकारात्मक मोड़ देते हुए कहा कि जो लेसन कठिन लगता हो या कोई आंसर याद न हो उसके नोट्स तैयार कीजिये और पॉइन्टवाइस बड़े अक्षरों में कागज में लिखकर उसे आइने के पास लगा दें। जब भी आप आइने के पास जाएं इन्हें पढ़कर रिवाइज़ कर लिया करें। बार-बार पढ़ने से यह हमें याद हो जाएगा। अपने नोट्स खुद तैयार करें, किसी चीज के लिए माता-पिता से जिद्द न करें, उन्हें जानकारी जरूर दें कि आपको किस चीज की जरूरत है। यदि वह चीज आवष्यक होगी तो वे खुद ही उसकी व्यवस्था में लग जाएंगे। माता-पिता के दिल में स्थान बनाइए, उनकी दुआएं लीजिये तो हर राह खुलती जाएगी। वे थकते हैं तो उनके हाथ-पैर दबा दिया करें।
छोटे, बड़े सभी बच्चों को कुछ महत्वपूर्ण बातें बताते हुए आपने कहा कि पढ़ाई के समय नो टीवी, नो मोबाइल, नो लड़ाई-झगड़ा। मोबाइल और टीवी तो टीबी की बीमारी की तरह हैं। खेलने का समय जरूर निर्धारित करें। रोज रात को जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठकर हाथ-मुंह धोकर कुछ पल ध्यान करें, थोड़ा आसन-प्राणायाम, पांच मिनट कपालभाति, पांच मिनट अनुलोम-विलोम करके एक घण्टे पढ़ाई करें, फिर स्नान करके माता-पिता, दादा-दादी या अपने बड़ों के पैर छूकर ही स्कूल जाएं क्योंकि स्कूल एक मंदिर की तरह है और स्नान करके स्कूल जाने से हम ताजगी से भरे रहेंगे और अंतिम पीरियड तक हमें सुस्ती, आलस्य या नींद नहीं आयेगी। अंत में दीदी ने सभी बच्चों को मेडिटेषन के माध्यम से उक्त बातों को धारण करने के लिए संकल्पित कराया। कार्यक्रम में बच्चों के अलावा उनके षिक्षक-षिक्षिकाएं उपस्थित थे।

ब्रह्माकुमारी संस्थान की प्रथम मुख्य प्रषासिका मातेष्वरी जी की 53वीं पुण्यतिथि मनायी गई

सादर प्रकाषनार्थः-
प्रेस-विज्ञप्ति
तपस्या की प्रतिमूर्ति थीं मातेष्वरी जी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
पवित्रता, एकनामी व इकॉनॉमी मम्मा की चारित्रिक विषेषता
ब्रह्माकुमारी संस्थान की प्रथम मुख्य प्रषासिका मातेष्वरी जी की 53वीं पुण्यतिथि मनायी गई
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बिलासपुर टिकरापारा, 24 जूनः- प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईष्वरीय विष्व विद्यालय की प्रथम मुख्य प्रषासिका मातेष्वरी जगदम्बा सरस्वती जी की 53वीं पुण्यतिथि मनायी गई। आज ही के दिन संपूर्ण स्वरूप को प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने 24 जून 1965 को अपने नष्वर शरीर का त्याग किया था। आज के दिन संस्थान के सभी सेवाकेन्द्रों में विषेष आयोजन किये गए हैं। टिकरापारा सेवाकेन्द्र में ब्रह्माकुमारी बहनों एवं संस्था के सदस्यों के द्वारा मम्मा की षिक्षाओं को धारण करने का संकल्प लेते हुए उन्हें मौन श्रद्धांजलि दी गई।
ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने मातेष्वरी जी के चरित्र पर प्रकाष डालते हुए कहा कि मातेष्वरी जी के अंदर छोटे, बड़े, वृद्ध सभी के प्रति मातृत्व की भावना भरपूर थी सभी ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियां उन्हें प्यार से मम्मा कहकर संबोधित करते थे। संस्था के साकार संस्थापक पिताश्री ब्रह्माबाबा के साथ यज्ञ (संस्था) की स्थापना के निमित्त रह प्रथम मुख्य प्रषासिका बनी। मम्मा की मुख्य विषेषताएं थी कि वे परमात्मापिता एवं उनके श्रीमत के प्रति संपूर्ण निष्चयबुद्धि थे, एकनामी अर्थात् एक भगवान की याद की तपस्या उनके जीवन में स्पष्ट दिखाई देता, वे ब्रह्ममुहूर्त में प्रातः 2 बजे से ही उठकर तपस्या में लग जाती थीं। धन के साथ-साथ संकल्प एवं बोल की भी इकॉनॉमी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उनमें ज्ञान की पराकाष्ठा गहराई तक थी, प्रतिदिन सत्संग सुनने के पश्चात् मम्मा तुरंत ही उसका विचार सागर मंथन कर सरल शब्दों में साधकों के आगे स्पष्ट करते थे जिन्हें वे अपने जीवन में सहजता से आत्मसात कर सकें। ज्ञान सुनाने के पश्चात् मम्मा ऐसा मौन में तपस्यारत हो जातीं कि जैसे वे इस साकारी दुनिया में हैं ही नहीं। उनका ध्यान निजी पुरूषार्थ पर बहुत रहता था। उनके मुख से सदा यही बोल निकलते कि जैसा कर्म हम करेंगे, हमें देख सब करेंगे। उनकी यह भी धारणा थी कि हर घड़ी अंतिम घड़ी समझकर पुरूषार्थ करते रहें और कर्म करते स्मृति रहे कि हुकुमी हुकुम चला रहा है।
कभी ख्याल न आए कि यह षिक्षा क्यों मिली
मम्मा कहते थे कि कभी कोई भी षिक्षा मिले तो उसे संभाल कर रखना। कभी यह ख्याल न आए कि यह षिक्षा मुझे क्यों मिली, मेरी भूल तो थी नहीं। षिक्षा बड़ी काम की होती है, समय पर बहुत काम आती है। यह न समझें कि यह छोटा मुझे सिखाने वाला कौन होता है, इस प्रकार मम्मा ने सभी के अंदर सीखने की भावना उत्पन्न की।
कार्यक्रम के अंत में सभी ने मातेष्वरी जी के निमित्त परमात्मा को भोग स्वीकार कराया तत्पष्चात् सभी ने मौन श्रद्धांजलि देकर प्रसाद ग्रहण किया।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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ध्यान के लिए सकारात्मक चिंतन जरूरी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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ध्यान के लिए सकारात्मक चिंतन जरूरी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
प्यार मांगने वाले नहीं, प्यार देने वाले बनें…
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बिलासपुर टिकरापारा, 17 जूनः- ध्यान की अनुभूति के लिए सकारात्मक चिंतन का होना बहुत जरूरी है, बिना अच्छे विचार के हम मन को सकारात्मक दिशा प्रदान नहीं कर सकते क्योंकि मन का कार्य ही है विचार करना। धन, पद-प्रतिष्ठा, समाज में इज्जत आदि सब बहुत जरूरी है लेकिन वो जीवन जीते हुए भी हमारे भीतर सकारात्मकता बनी रहे, उसके लिए आध्यात्मिक ज्ञान की पराकाष्ठा का होना बहुत जरूरी है। हमने बहुत सारी ज्ञान की बातें सीखी लेकिन स्वयं की गहराई महसूस नहीं कर पाते। इसके लिए एक कहावत है कि रूह और जिस्म का अजीब इत्तेफाक है कि उम्रभर तो साथ रहे पर रू-ब-रू न हो सके। बचपन से ही हमें पढ़ाई की ओर तो ले जाया जाता है, ये अच्छी बात तो है लेकिन इसके साथ-साथ आध्यात्मिकता को धारण करना हमें हर क्षेत्र में स्थिरता प्रदान करता है। प्रेम आत्मा का मूल गुण है लेकिन हम सभी एक-दूसरे से प्रेम की डिमाण्ड कर रहे हैं लेकिन है किसी के पास नहीं। क्योंकि हम सभी डिस्चार्ज बैटरी की तरह हो गए हैं तो एक डिस्चार्ज बैटरी दूसरे डिस्चार्ज बैटरी को चार्ज कैसे करेगी। इसके लिए चार्जर की जरूरत है और चार्जर है मेडिटेषन, योगनिद्रा, ध्यान। और मेडिटेषन के माध्यम से हम उस पॉवर हाउस परमात्मा से अपना कनेक्षन जोड़कर चार्ज हो जाते हैं। जिससे हमारे अंदर शांति, सुख, प्रेम, आनंद, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति का अविरल धारा का प्रवाह होता है।
ये बातें गुरूनानक स्कूल, दयालबंद बिलासपुर स्थित महाराजा रणजीत सिंह सभागार में आयोजित सात दिवसीय योग षिविर के तीसरे दिन उपस्थित पीएससी के छात्र-छात्राओं को प्रेरित करते हुए छ.ग. योग आयोग की सदस्य एवं ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही।
प्राणायाम, आसन के साथ आज सभी ने किया योगनिद्रा का अभ्यास
दीदी ने आज सभी योग साधकों को योगनिद्रा का अभ्यास कराकर गहन शांति की अनुभूति कराई। आपने इसका लाभ बताते हुए कहा कि योगनिद्रा के अभ्यास से भय, क्रोध, चिंता, तनाव, अवसाद से मुक्ति मिलती है तथा एकाग्रता, स्मृति व मनोबल का विकास होता है। दीदी जी ने जानकारी दी कि योग षिविर के पश्चात् प्रतिदिन प्रातः 7ः30 से 8ः15 बजे 21 जून के योग के लिए प्रोटोकॉल के अनुसार प्रषिक्षण प्रदान किया जा रहा है जो भी साधक प्रषिक्षण प्राप्त करना चाहते हैं, वे सादर आमंत्रित हैं।
स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और सुखी जीवन का आधार – राजयोग
टिकरापारा में आज से राजयोग अनुभूति षिविर आरंभ
मंजू दीदी जी ने बताया कि ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान द्वारा विगत 32 वर्षों से माह के तीसरे रविवार को पूरे विष्व के 140 देषों में एक साथ और एक ही समय पर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है। इस दिन शाम को 6ः30 बजे सारे विष्व में सभी ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियां मिलकर राजयोग के अभ्यास के द्वारा सारे विष्व में शान्ति के प्रकम्पन्न फैलाते हैं।
राजयोग सीखने के इच्छुक लोगों के लिए ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा टिकरापारा स्थित सेवाकेन्द्र में प्रतिदिन सायं 7 से 8ः30 बजे निःषुल्क राजयोग षिविर का आयोजन किया गया है। मंजू दीदी जी के सानिध्य में आयोजित इस षिविर में शामिल होकर राजयोग मेडिटेषन की अनुभूति, स्प्रीच्युअल काउंसिलिंग आदि का लाभ लिया जा सकता है।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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अपोलो हॉस्पिटल में अदभुत मातृत्व पर हुई गोष्ठी, गर्भकाल को किया रेखांकित

सादर प्रकाषनार्थः
मां है संस्कारदात्री और घर है संस्कारों की पाठषाला – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
अपोलो हॉस्पिटल में अदभुत मातृत्व पर हुई गोष्ठी, गर्भकाल को किया रेखांकित
महिलाओं ने जाना कैसे प्राप्त की जा सकती है स्वस्थ और संस्कारवान संतान

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बिलासपुर टिकरापारा, 16 जून। अपोलो हॉस्पिटल में मातृत्व के सफर का अदभुत अहसास कराया गया। यहां आने वाले मरीजों, तीमारदारों और आमंत्रित आम शहरवासियों को बताया गया कि कैसे एक गर्भकाल में ही संतान के अंदर अच्छे स्वास्थ्य और संस्कारों का सृजन किया जा सकता है, ताकि एक अच्छी भावी पीढी का निर्माण किया जा सके।
इस अवसर पर अद्भूत मातृत्व विषय पर प्रकाष डालते हुए ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी एवं छ.ग. योग आयोग की सदस्य ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने बताया कि संस्कारवान, बुद्धिमान व तेजस्वी संतान प्राप्त करने के लिए गर्भकाल से लेकर 3 वर्ष की उम्र तक का समय सबसे उत्तम समय है। संस्कार देने में सबसे अहम भूमिका मां की होती है और हमारा घर संस्कारों की पाठषाला की तरह है इसलिए घर का वातावरण शांति, सौहार्द्रपूर्ण, सद्भावना से भरा हो, रिष्तों में मिठास हो, चाहे वो पति-पत्नि, सास-बहू, बच्चों और माता-पिता के बीच का ही संबंध हो। अंत में दीदी ने सभी को तेरी उंगली पकड़ के चला गीत पर सूक्ष्म आसनों का अभ्यास कराया, जो गर्भवती माताओं को नियमित करने से उन्हें काफी लाभ मिलेगा एवं गाइडेड मेडिटेषन कॉमेन्ट्री के माध्यम से ध्यान की अनुभूति कराई।
इस अवसर पर अपोलो हॉस्पिटल के गायनेकोलॉजिस्ट बहन डॉ. कविता बब्बर ने गर्भवती माताओं को बच्चे व मां की फिटनेस का ख्याल रखने हेतु खान-पान, नियमित चेक-अप, सुरक्षा, सावधानियां एवं सामान्य व असामान्य लक्षणों से अवगत कराया। इसके साथ ही चाइल्ड स्पेषलिस्ट डॉ. सुषील तिवारी एवं इन्द्रा मिश्रा ने भी बच्चों की देखभाल के तरीके बताये।
इससे पूर्व अपोलो हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. पी.के. पाण्डा, डॉ. कविता बब्बर, एवं ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम की शुरूआत की। तत्पष्चात् गर्भवती महिलाओं का उत्साहवर्धन करने के लिए गौरी बहन ने पूछो ना है कैसी मेरी मां…….गीत पर भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में अतिथियों के साथ, ब्र.कु., शषी बहन, ब्र.कु, गायत्री बहन, ब्र.कु. पूर्णिमा बहन, गर्भवती महिलाएं एवं नर्सिंग स्टाफ मौजूद थे।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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वरदानों की वेला है ब्रह्ममुहूर्त का समय – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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वरदानों की वेला है ब्रह्ममुहूर्त का समय – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
थकान दूर कर ऊर्जा प्रदान करता है योगनिद्रा
षिविर के दूसरे दिन योग साधकों की संख्या बढ़़ी
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बिलासपुर, टिकरापारा, 16 जून.ः- पढ़ाई के लिए प्रातः काल का समय जिसे अमृतवेला या ब्रह्ममुहूर्त भी कहा जाता है, सबसे उत्तम समय है। इस समय का वातावरण शांत व शक्तिषाली होता है और बुद्धि भी व्यर्थ की बातों से मुक्त रहती है जिससे स्मृति पॉवरफूल हो जाती है। यदि इस समय हम सोये रहते हैं तो मानो अमृत से वंचित रह जाते हैं इसलिए कहते भी हैं कि जब भगवान भाग्य बांट रहे थे तब आप सोए थे क्या। क्योंकि इस समय हमारा सबकॉन्षियस माइण्ड भी एक्टिव रहता है। हमें इस समय उठकर कुछ पल ध्यान करके पढ़ाई में लग जाना चाहिये। 20 मिनट का ध्यान हमारे आठ की थकान को दूर कर देता है और 5 मिनट का बॉयलिंग टेम्पर पर किया गया गुस्सा हमारे दो घण्टे कार्य करने की शक्ति को नष्ट कर देता है।
उक्त बातें गुरूनानक स्कूल के महाराजा रणजीत सिंह सभागार में आयोजित योग षिविर के दूसरे दिन पीएससी स्टूडेन्ट्स को संकारात्मक विचार देते हुए टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने सभी शहरवासियों को आग्रह किया है कि इस षिविर का लाभ सभी ले सकते हैं। कल के सत्र में विषेष योगनिद्रा का अभ्यास भी कराया जायेगा जो कि एकाग्रता बढ़ाने व शारीरिक ऊर्जा की वृद्धि में सहायक है। आज के सत्र के पश्चात् सभी मास्टर ट्रेनर्स को दीदी जी ने प्रोटोकॉल के अनुसार योग का अभ्यास कराया।
डिप्टी कलेक्टर आषुतोष चतुर्वेदी जी ने आतिथेय उद्बोधन के रूप में कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए हमारा ज्ञान, हमारी इच्छा और हमारा कर्म एक ही दिषा में जाना चाहिये। ज्यादातर होता यह है कि हम ज्ञान कुछ और लेते हैं,
हमारी इच्छा कुछ और होती है और हमारे कर्मों की दिषा कहीं और होती है जो सबसे बड़ा कारण है कि हमें सफलता नहीं मिल पाती। भगवान पर विष्वास तो करें ही लेकिन इसके साथ स्वयं पर विष्वास का होना भी बहुत जरूरी है। आज के सत्र में योग साधकों की संख्या में वृद्धि हुई। अंत में सभी ने युवा, ये युवा हैं, सबको प्यारे युवा….गीत पर यौगिक जॉगिंग का अभ्यास किया एवं भारत माता की आरती के साथ आज का सत्र सम्पन्न हुआ।

भ्राता सम्पादक महोदय,
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