अपने कर्मों के परिणाम के लिए हम स्वयं जिम्मेवार हैं ईष्वर दोषी नहीं…- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
अपने कर्मों के परिणाम के लिए हम स्वयं जिम्मेवार हैं ईष्वर दोषी नहीं…- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ज्ञान का अर्थ भगवान के लिए घर बार छोड़ना नहीं बल्कि उन्हें अपने घर का सदस्य बनाना है..
घर-गृहस्थ, जिम्मेवारियों, कर्तव्यों का सन्यास नहीं, सन्यास करना है बुरी आदतों का

मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का बारहवां सप्ताह
गीता के पांचवे अध्याय – कर्म-सन्यासयोग का किया गया आध्यात्मिक विवेचन

बिलासपुर, टिकरापाराः- परमात्मा हर मनुष्य आत्मा को विवेकयुक्त बुद्धि और स्वतंत्रता – ये दो गिफ्ट देते हैं। जिसके कारण हमें अपने अच्छे व बुरे कर्मों का ज्ञान होता है। जब भी हम गलत काम करते हैं तो हमारी बुद्धि, हमारा कॉन्शियस हमें अलाउ नहीं करता हमारा विवेक विरोध जरूर करता है लेकिन फिर भी इन्द्रियों के वश होकर हम अपने विवेक का खून कर देते हैं व गलत कार्य की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिए कभी-भी हमें अपने जीवन की किसी भी घटना के लिए ईश्वर को दोषी नहीं ठहराना चाहिए क्योंकि हर परिणाम के लिए केवल और केवल हमारे ही कर्म जिम्मेवार हैं।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के बारहवें सप्ताह में साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने सन्यास योग व कर्मयोग में श्रेष्ठता के संबंध में अर्जुन के द्वारा भगवान से पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताते हुए कहा कि कर्म का सन्यास तो हो ही नहीं सकता वास्तव में हमें सन्यास करना है बुरी आदतों का, विकारों का। घर-गृहस्थ में रहते हुए अपनी जिम्मेवारियों व कर्तव्यों को बखुबी निभाना है।
ज्ञान का अर्थ भगवान के लिए घर बार छोड़ना नहीं है बल्कि सही ज्ञान तो वह है जब हम भगवान को अपने घर का एक मुख्य सदस्य बना लें। हर बात उनसे साझा करें। ब्रम्हाकुमारीज़ में हम बहनें समर्पित होती हैं इसका ये अर्थ नहीं है कि हमने घर-गृहस्थ का त्याग किया है। सामाजिक एक्टिविटीज़ में शामिल भी होते हैं। हमने तो परमात्मा को अपने परिवार का मुखिया बनाया है। वे सारे संसार के पालनहार हैं, ईश्वर हमारे परमपिता हैं और सारा संसार ईश्वर का परिवार है इस तरह के दृष्टिकोण से वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जागृत होती है।
दीदी ने बताया कि व्यक्ति को बांधने वाला कर्म नहीं, उसके कर्म करने की वृत्ति है। कर्मयोग के बिना सन्यास की प्राप्ति नहीं हो सकती। भगवान ने अर्जुन को बताया कि तुम शरीर नहीं एक आत्मा हो और एक योगी आत्म अनुभव करता हुआ हर कर्म को साक्षी भाव से देखता है। ऐसे आसक्ति को त्याग कर कर्म करने वाला पुरूष जल में कमल की भांति पाप में लिप्त नहीं होता। दीदी ने दृष्टांत देकर समझाया कि कैसे अष्टावक्र ने राजा जनक को एक सेकण्ड में जीवन में रहते हुए मुक्ति की अवस्था का अनुभव कराया। और बताया कि मुक्ति से श्रेष्ठ जीवनमुक्ति की अवस्था है। ऐसा व्यक्ति नौ द्वारों वाले इस शरीर रूपी घर में सब कर्म करते हुए आनंदपूर्वक सच्चिदानंद परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।
एक अन्य उदाहरण में आपने बताया कि परमात्म ज्ञान से कैसे महर्षि वाल्मिकी के अज्ञान का नाश हुआ और उनका जीवन परिवर्तन हो गया जिससे वे लुटेरे से महर्षि बन गए। मेडिकल साइंस में आत्मा की स्थिति को बताया गया कि आत्मा हाइपोथैलेमस और पीट्यूटरी ग्लैण्ड के मध्य में विराजित रहती है। जिस आत्मा की स्मृति के लिए हम माथे पर तिलक या बहनें माताएं बिन्दी लगाती हैं। इसीलिए मंदिर जाने से पहले चमड़े की चीजें बाहर छोड़कर जाते हैं।
क्लास का प्रसारण यूट्यूब एवं फ्री कांफ्रेन्स कॉल एप के माध्यम से किया जाता है जिससे अनेक साधक इसका लाभ लेते हैं। दीदी जी ने जानकारी दी कि अगले रविवार के सत्र में भगवान ने ध्यान में बैठने का जो साइंटिफिक तरीका बताया है उसके बारे में बताया जायेगा।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

हम स्वयं ही होते हैं अपनी सफलता में बाधक – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
हम स्वयं ही होते हैं अपनी सफलता में बाधक – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
व्यर्थ व अनावष्यक बातों को पकड़े रहने से मन हो जाता है पैरालाइज़्ड
स्वयं का स्वयं के साथ रिष्ता सबसे महत्वपूर्ण रिष्ता
ज्ञान यज्ञ है सभी यज्ञों में श्रेष्ठ
मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का ग्यारहवां सप्ताह
गीता के चौथे अध्याय-ज्ञान योग का आज समापन

बिलासपुर, टिकरापाराः- भगवान ने कलियुग के अंत के लक्षण बताए हैं कि जब गाय विष्ठा में मुख डाले, अनाज पैकेटों में व दूध बोतलों में बिकने लगे, कन्या अपने मुख से वर मांगने लगे, एक कुंआ चार कुंओं को भर ले किन्तु चार कुंएं एक कुंए को न भर सके अर्थात् एक मात-पिता अपने चार बच्चों को संभाल ले किन्तु चार बच्चे मिलकर अपने मात-पिता को न संभाल सके तब समझना कि कलियुग के अंत का समय नजदीक है और परमात्मा के आने का समय हो चुका है। ये सभी लक्षण आज प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे हैं। अर्थात् परमात्म अवतरण की वेला चल रही है यही काल पुरूषोत्तम संगमयुग कहलाता है। जैसे हर तीन वर्ष में एक बार अधिक मास आता है जिसका बहुत महत्व है उसी प्रकार पूरे कल्प में इस पुरूषोत्तम संगमयुग का महत्व है। इस धरा पर अवतरित हुए परमात्मा को तत्वज्ञानी आत्मा का अनुभव करने वाले ज्ञानीजन ही पहचान पाते हैं। और इन्हीं तत्वदर्शी ज्ञानी महात्माओं के द्वारा अन्य लोग परमात्म तत्व का उपदेश सुनेंगे।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के ग्यारहवें सप्ताह में साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने यज्ञ के संबंध में अर्जुन के द्वारा भगवान से पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताते हुए कहा कि ज्ञान यज्ञ सर्व यज्ञों में श्रेष्ठ है, यह परमकल्याणकारी है, इसमें आत्मा का शुद्धिकरण होता है, महान पाप आत्माएं भी संसार सागर को पार कर लेती हैं जिस प्रकार अग्नि इंर्धन को भस्म कर देती है उसी प्रकार ज्ञान सर्व विकर्मों को भस्म कर देता है, साधनों की आसक्ति और मोह को समाप्त कर देता है।
द्रव्य यज्ञ करने वाले अनेक होते हैं इसमें सांसारिक वस्तुओं की प्रधानता होती है। अग्नि में विभिन्न सामग्री डालकर हवन करना, दान देना, परोपकार के लिए कुंआ, स्कूल, धर्मशाला, हॉस्पीटल आदि बनवाना – ये सभी द्रव्य यज्ञ के अंतर्गत आते हैं। इससे भिन्न कोई साधक अपने विवेक, विचार और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रयोग कर शुभ कर्म को ज्ञान के अधिकार के साथ प्रयोग करता है अतःज्ञान यज्ञ सर्व यज्ञों में श्रेष्ठ है।
विभिन्न परिस्थितियों का निदान इस गीता ज्ञान यज्ञ से होता है। स्वामी विवेकानंद जी का उदाहरण देते हुए आपने कहा कि स्वामी जी के विदेश प्रवास के दौरान एक विदेशी महिला ने स्वामी विवेकानंद जी से उनके समान पुत्र की चाहना की अर्थात् विवाह का प्रस्ताव रखा तब स्वामी विवेकानंद ने अपने संयम व विवेक के आधार पर उन्हें मां संबोधित करते हुए कहा कि वे उन्हें ही अपना बेटा स्वीकार कर ले।
जिस प्रकार हल्की से हल्की चीज को भी बहुत देर तक पकड़े रहने से हाथों को तकलीफ होती है या पैरालाइज़्ड भी हो सकता है उसी प्रकार व्यर्थ विचारों या बातों से मन की भी पीड़ा बढ़ जाती है या पैरालाइज़्ड हो जाता है अर्थात् डिप्रेशन की स्थिति आ जाती है। इसलिए बुद्धि को तेज करने व उसकी क्षमता को बढ़ाने के लिए सकारात्मक व ज्ञानयुक्त बातें ही करनी चाहिए। इसलिए भगवान ने अर्जुन को ज्ञानयुक्त विवेक की तलवार से अज्ञानजनित संशय का नाश कर युद्ध करने के लिए तैयार हो जाने की बात कही अर्थात् कर्मयोगी बनने की सलाह देते हुए चौथे अध्याय का उपसंहार किया।
एक अन्य कहानी के माध्यम से आपने बताया कि आप ही एक व्यक्ति हैं जो अपने उन्नति की सीमा निर्धारित कर सकते हैं, अपने जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं, अपनी खुशी, ज्ञान व सफलता को प्रभावित कर सकते हैं, केवल आप ही अपनी मदद कर सकते हैं। ये सोचना गलत है कि लोग बदलेंगे या दुनिया बदल जायेगी तो आपका जीवन बदलेगा बल्कि आपका जीवन तब बदलता है जब आपमें परिवर्तन आता है। अपने जीवन के जिम्मेवार आप ही हैं। अपनी जांच करें, दूसरों के सामने अपने को अच्छी तरह संभालें, कठिनाईयों, असंभव और नुकसान से डरें नहीं, एक विजेता बनें और अपनी वास्तविकता का निर्माण करें।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

विवश मनुष्य को संस्कारित करते हैं भगवान – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाशनार्थ
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विवश मनुष्य को संस्कारित करते हैं भगवान – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
परमात्म अनुभव के लिए दिव्य बुद्धि रूपी नेत्र जरूरी
परमात्मा का ज्योति स्वरूप सर्वधर्ममान्य व सार्वभौमिक सत्य

ज्योतिर्लिंग, नूर, जेहोवा, निराकार, अखण्ड ज्योति, शिव, शिलापति आदि के रूप में परमात्मा याद किया
मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का दसवां सप्ताह
गीता का चौथा अध्याय – ज्ञान-कर्म-सन्यास योग की विवेचना की गई

बिलासपुर, टिकरापाराः- जिस युग में धर्म की अतिग्लानि होने लगती है, मनुष्य में विवशता आ जाती है तब उसे पुनः संस्कारित कर सूर्यवंशी बनाने के लिए भगवान धरती पर आते हैं। चार वर्णों की रचना भगवान ने नहीं की, ये तो मनुष्य के कर्मां की गुणवत्ता पर आधारित है। सतयुग त्रेता में इंसान भगवान जैसे थे, द्वापर में इंसान इंसान जैसा रहने लगा लेकिन कलियुग में तो इंसान में असुरत्व आता गया। ज्ञानसूर्य परमात्मा ने यह ज्ञान मनु अर्थात् मन को दिया। मनु ने इक्ष्वाकु को और फिर राजऋषियों को यह ज्ञान मिला उसके बाद लुप्तप्राय हो गया। ज्ञान लुप्तप्राय नहीं हुआ लेकिन मनुष्य के जीवन से सभी बातें, सभी संस्कार लगभग लुप्त होने के कगार पर है अब पुनः इस गीता के युग में परमात्मा यह ज्ञान दे रहे हैं और अधर्म का नाश कर एक सत्य धर्म सत्य युग की स्थापना का कार्य कर रहे हैं ऐसी दुनिया जहां एक धर्म, एक राज्य, एक भाषा, एक कुल, एक मत होगी, सुख-शान्ति संपन्न राज्य होगा।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के दसवें सप्ताह में साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने आगे कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता को समझने के लिए हमें अपने ज्ञान कपाट को खोलकर रखना जरूरी है। भगवान के अवतरण को सिद्ध करने के लिए उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक बच्चे के संकट के समय पिता ये नहीं सोचता कि कोई और उसे बचा लेगा, बिना किसी देरी के किसी भी कीमत पर वह स्वयं ही उसे बचाने का प्रयत्न करता हैं। उसी प्रकार जब परमात्मा की हम सभी संतान डगमग होने लगती हैं तब भगवान को धरती पर आना पड़ता है।
परमात्मा के ज्योति स्वरूप को हिन्दू धर्म में ज्योतिर्लिंग, मुस्लिम धर्म में नूर, सिक्ख धर्म में निराकार, निर्भउ, निर्वैर, क्रिश्च्यन धर्म में लाइट, जैन धर्म में शिलापति, जापान में लाल पत्थर के रूप में जिसे चिंकोनसेकी कहा अर्थात् शांति के दाता, पारसी होली फायर के रूप में स्वीकार करते हैं। परमात्मा की महिमा में अजोनि, अजन्मा, अव्यक्त कहा गया है। तुलसी दास जी ने भी परमात्मा के निराकार स्वरूप के बारे में कहा है कि वह बिना पैर के चलता है, बिना कान के सुनता है, बिना हाथों के कर्म करता है, बिना जीभ के सभी रसों का आनन्द लेता है बिना वाणी के बहुत बड़े वक्ता हैं ऐसी परमात्मा की महिमा है।
वह चौथे अध्याय में परमात्मा की सत्य पहचान व उनके अवतरण के लक्षण के बारे में विस्तार से बताया गया है। केवल तत्वदर्शी अर्थात् आत्मज्ञानी ही परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं जो ज्ञान और साधना के द्वारा पवित्र बनते हैं, भय और क्रोध से मुक्त हैं वे परमात्मा के दिव्य जन्म को देख सकते हैं। कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को उदाहरण से समझाते हुए आपने कहा कि जैसे बीज बोना एक कर्म है, उसका फल खाना अकर्म है लेकिन बीज को पुनः बोना श्रेष्ठ कर्म है और वे ही बुद्धिमान योगी हैं।

प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

आध्यात्मिकता देती है मन रूपी घोड़े की दिषा बदलने की समझ – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
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जीवन का अनिवार्य अंग है कर्म…
आध्यात्मिकता देती है मन रूपी घोड़े की दिषा बदलने की समझ – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
संगदोष से बचे रहना कर्मयोगी की निशानी

मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का नौवां सप्ताह
गीता का तीसरा अध्याय समाप्त – कर्मयोग की विवेचना की गई

बिलासपुर, टिकरापाराः- कर्म करना जीवन का अनिवार्य अंग है। ज्ञानियों के लिए ज्ञानमार्ग और योगियों के लिए निष्काम कर्म मार्ग श्रेष्ठ है लेकिन दोनों के अनुसार कर्म तो करना ही पड़ता है। कर्मयोगी सदा संगदोष से बचा रहता है और यथार्थ कर्म करता है अर्थात् जो कर्म आत्म उन्नति के लिए हो। प्रजापिता ब्रह्मा ने यज्ञ रचकर दैवीय संस्कारों की वृद्धि की और ऐसे दैवीय संस्कार वालों के जीवन की हर आवश्यकता पूर्ण होती है, प्रकृति भी ऐसी आत्माओं की सेवा में हाजिर रहती है। कर्मयोगी के लिए वेद पढ़ने से अधिक महत्वपूर्ण किसी की वेदना पढ़कर उसकी मदद करना होता है। कहा जाता है जैसी दृष्टि – वैसी सृष्टि। हम जिस रंग का चश्मा पहनेंगे, हमें वैसा ही दृश्य दिखाई देगा। इसलिए गीता का संदेश है कि दैहिक रूप से हिंसा न कर अपने मन को जीतो। मन जीते जगत जीत है।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के नौवें सप्ताह में साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने आगे बताया कि ऐसे श्रेष्ठ पुरूष के आचरण का ही अनुसरण होता है जिन्हें हर कर्म के प्रति जागृति रहती है और यही भाव रहता है कि हम रंगमंच पर हैं हमारा अभिनय हर कोई देख रहा है। भगवान ने ज्ञानी पुरूष की जिम्मेवारी बनाई है कि यदि उसके कर्म से कोई आत्मा भ्रमित हो जाती है या मार्ग भटक जाती है तो उसकी जिम्मेवारी भी ज्ञानी पुरूष की ही है। परमात्मा हम सभी अर्जुन रूपी आत्माओं से कहते हैं कि रजोगुण से उत्पन्न काम, क्रोध, राग-द्वेष आदि के वशीभूत होकर मनुष्य पापकर्म करता है। ये विकार ज्ञानियों के विशेष वैरी हैं। काम, क्रोध से ज्ञान नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि को धुंआ ढं़क देता है, शीशे को धूल ढ़ंक देता है ऐसे ही आत्मा पर काम, क्रोध के विभिन्न अवस्थाओं का लेप चढ़ जाता है जिसकी तृप्ति कभी नहीं होती। इस पर जीत पाने के लिए निरंतर आध्यात्मिक पुरूषार्थ करना आवश्यक है।
आपने कहानी के माध्यम से बताया कि जिस प्रकार घोड़े को परछाई के भय से दूर करने के लिए उसकी दिशा बदलनी होती है उसी प्रकार आध्यात्मिकता हमें समझ देती है कि मन रूपी घोड़े की दिशा का परिवर्तन हम किस प्रकार करें। गीता में यज्ञ की विवेचना करते हुए बताया कि यज्ञ किया जाता है शुद्धिकरण के लिए। इसमें विशेष कर तीन चीजों की आहूति दी जाती है जौ, तिल और घी। शुद्धिकरण के लिए हमने स्थूल प्रक्रिया को अपनाया लेकिन सूक्ष्म भावार्थ को हमने समझा नहीं। तन, मन और धन का शुद्धिकरण करने के बजाय हमने प्रतीकात्मक रूप में जौ, तिल और घी को अग्नि में डाल दिया। सूक्ष्म भावार्थ यही है कि योग रूपी अग्नि के द्वारा हमें तन, मन व धन की शुद्धि करनी चाहिए। संगदोष में आने से अशुद्धिकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। उदाहरणस्वरूप धूम्रपान, व्यसन की लत लगी। जब मन उसके वशीभूत हुआ तो तन भी व्यसनसामग्री की दुकान पर गया फिर धन खर्च किया तो धन भी अशुद्ध कार्य में चला गया।
दीदी ने जानकारी दी कि आज के सत्र में कर्मयोग – तृतीय अध्याय का समापन हुआ अगले रविवार के सत्र में चतुर्थ अध्याय अर्थात् ज्ञानकर्मसन्यासयोग का वर्णन किया जायेगा।

प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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बिलासपुर (छ.ग.)

देवी-देवताएं ही सभी के पूर्वज हैं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
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श्राद्ध पर करें सभी को अपनत्व देने का संकल्प…
देवी-देवताएं ही सभी के पूर्वज हैं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
पितृ पक्ष श्राद्ध के अंतिम दिन टिकरापारा सेवाकेन्द्र के हार्मनी हॉल में पूर्वजों को लगाया भोग

बॉडी सेनिटाइजेशन व शारीरिक दूरी का पालन करते हुए चार समूहों मे क्लास कराई गई।
सभी के अंदर दया, रहम, प्रेम, क्षमा की भावना का समावेष जरूरी

बिलासपुर, टिकरापाराः- श्राद्ध के अवसर पर हम अपने पूर्वजों को भोग लगाते हैं व उनकी मुक्ति की कामना करते हैं। वास्तव में जब यह दुनिया सतोप्रधान थी तो इस लोक में देवी-देवताआें का राज्य था। और यही देवी-देवता धर्म इस सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष का मुख्य तना है जिससे कालांतर में सभी धर्म, मठ, पंथ, समाज रूपी शाखाएं विकसित हुए हैं। अब इस कलयुग के अंत अर्थात् महापरिवर्तन काल में सभी धर्म की आत्माएं एक मंच पर उपस्थित होकर एक पिता परमात्मा का परिचय देंगी। उसके पश्चात् ही दैवीय दुनिया का इस सृष्टि पर आगमन होगा।
उक्त बातें आज श्राद्ध के अंतिम दिन अपने पूर्वजों के आह्वान के साथ उन्हें भोग स्वीकार कराने के पश्चात् सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी ने कही। दीदी ने कहा कि पुनर्जन्म में आते-आते हम अपने को देह समझने लगे हैं क्योंकि अपने पूर्व जन्म को भूल चुके हैं लेकिन परमात्मा हमें बताते हैं कि हम ही पूर्वज हैं क्योंकि आत्मा तो अजर-अमर-अविनाशी सत्ता है। शरीर नष्ट हो जाता है लेकिन आत्मा की यात्रा तो निरंतर चलती ही रहती है। और पूर्वज आत्मा के अंदर प्रेम, दया, रहम, क्षमा की भावना का होना बहुत जरूरी है क्योंकि बड़ों का स्वरूप हमेंशा क्षमा का होना चाहिए भले ही छोटे उत्पात ही क्यों न मचाये। इस कल्याणकारी संगमयुग के समय सच्चा श्राद्ध हमें ही करना है।
दीदी ने सभी साधकों से कहा कि इस कोरोना काल में सभी अपने स्वास्थ्य का ध्यान जरूर रखें, गर्म पानी पीयें, दिन में दो-तीन बार भाप लें व शासन द्वारा कोरोना से सुरक्षा व सावधानी के जो भी निर्देश हैं उनका पालन करें।
टिकरापारा सेवाकेन्द्र में गुरूवार को पितृ पक्ष श्राद्ध के अंतिम दिन पूर्वजों को भोग लगाया गया। शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए दिन भर में चार ग्रुप में सत्संग कराया गया। बॉडी सेनिटाइजेशन व मास्क लगाने के नियम का पालन करते हुए साधकों ने सत्संग का लाभ लिया। साथ ही ऑनलाइन मीटिंग के माध्यम से अन्य साधकों ने भी सत्संग में जुड़े रहे। जिसमें पूना, नागपुर, रायगढ़, तमनार आदि दूरस्थ स्थानों के भाई-बहन भी शामिल थे।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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बिलासपुर (छ.ग.)

जो परिवर्तन का कारण बनते हैं वहीं दुनिया का नेतृत्व करते हैं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
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जो परिवर्तन का कारण बनते हैं वहीं दुनिया का नेतृत्व करते हैं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
संयमी व्यक्ति ही शूरवीर है…
मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का आठवां सप्ताह
स्व-अनुशासन व योग की सिद्धि से छू सकते हैं जीवन की ऊंचाईयां
अहंकार और इच्छा ही अषान्ति का कारण है
गीता का दूसरा अध्याय समाप्त

बिलासपुर, टिकरापाराः- जिस प्रकार तूफान जल में तैरती नाव को लहरों में भटकाता है या पानी में डूबा देता है उसी प्रकार इन्द्रियों का आकर्षण बुद्धि रूपी नाव को भगवान की याद से हटाकर भोगों की प्राप्ति का उपाय सोचने में लगाकर भटका देता है या पापों में प्रवृत्त करके उसका अधोपतन कर डूबो देता है। जो व्यक्ति अपने मन व इन्द्रिय को वश में करके भगवान की याद में रहता है वही संयमी है। ऐसे संयमी को ही गीता में शूरवीर व महाबाहू कहा गया है न कि शरीर से बलशाली व्यक्ति को क्योंकि संयमी व्यक्ति ही अपनी बुद्धि को परमात्मा में लगा सकता है। मन और बुद्धि को सही तरह से निर्देशित कर स्वयं को सुसंस्कारित बनाना ही योग है और इसी योग से ही व्यक्ति के जीवन में संयम धारण होता है। योग की नियमितता व स्वअनुशासन से हम आत्मउन्नति कर सकते हैं अर्थात् जीवन की ऊंचाईयों तक पहुंच सकते हैं।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के आठवें सप्ताह में साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने कहा कि भगवान ने अर्जुन को सभी बातें स्टेप बाई स्टेप विज्ञान के तर्कसंगत रूप से समझायी और कहा कि हमारे जीवन में अहंकार व इच्छाएं ही अशान्ति का कारण है। आत्म उन्नति के प्रति उदासीन रहने वाला व्यक्ति वास्तव में अपने ही विनाश के मार्ग पर आगे बढ़ता है। बदलना तो एक दिन पड़ेगा ही लेकिन जो परिवर्तन के बाद या परिवर्तन के साथ बदलने के बजाय परिवर्तन का कारण बनते हैं वे ही इस दुनिया का नेतृत्व करते हैं।
दीदी ने जानकारी दी कि आज के सत्र में द्वितीय अध्याय का समापन हुआ अगले रविवार के सत्र में तृतीय अध्याय अर्थात् कर्मयोग का वर्णन किया जायेगा।

प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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बिलासपुर (छ.ग.)

विषय चिंतन व क्रोध योगियों के महान शत्रु हैं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

 सादर प्रकाषनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
विषय चिंतन व क्रोध योगियों के महान शत्रु हैं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
कामना व क्रोध से बुद्धि का नाष व मनुष्य का पतन हो जाता है
इन्द्रिय संयम, विषय त्याग और राग द्वेष से रहित होना भगवत्प्राप्ति में सहायक
मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का सातवां सप्ताह
स्थितप्रज्ञ अर्थात् स्थिरबुद्धि की परिभाषा व क्रोध के नुकसान के बारे में बताया गया…

बिलासपुर, टिकरापाराः- विषयों का चिंतन करने से उसमें आसक्ति उत्पन्न हो जाती है, आसक्ति से कामना और कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध से मूढ़ भाव उत्पन्न होता है जिससे स्मरण शक्ति भ्रमित हो जाती है उसे समझ नहीं आता कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान नहीं रहता, बुद्धि का नाश हो जाता है इससे बुद्धिमान से बुद्धिमान मनुष्य की भी मानसिक स्थिति गिर जाती है। इसे आज की परिभाषा में डिप्रेशन या अवसाद कहा जाता है। इससे बचने के लिए सभी इन्द्रियों अर्थात् कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों को वश में रखना आवश्यक है। जब सभी इन्द्रियां वश में होंगी तो आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी। लेकिन यदि एक भी इन्द्रिय में विषयों के प्रति आसक्ति हुई तो वह बुद्धि को अपनी ओर आकर्षित कर लेगी और बुद्धि की एकाग्रता, स्थिरता भंग हो जाएगी तथा मन विचलित हो जाएगा और नियंत्रण अपने हाथ में नहीं रहेगा। इसके लिए व्यक्ति को आंतरिक प्रसन्नता के साथ ईश्वर के  ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। इससे दुखों का नाश हो जाएगा और बुद्धि परमात्मा में एकाग्र होकर स्थिर हो जाएगी। हालांकि नए साधक ध्यान अभ्यास के लिए शुरूआत में मेडिटेशन कॉमेन्ट्री या गीतों का सहारा ले सकते हैं। धीरे-धीरे अभ्यास होने से फिर चलते-फिरते वह स्थिति बनी रहती है।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के सातवें सप्ताह में साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। दीदी ने इस भाग में स्थिरबुद्धि व्यक्ति की परिभाषा, उनके बोल, चाल आदि लक्षणों के बारे में विस्तार से बताया। स्थिरबुद्धि वाले मनुष्य को दुख में अभाव नहीं सताता और सुख में किसी व्यक्ति, वस्तु या वैभव की कमी से भी प्रभावित नहीं होता, सातों गुणों से संपन्न, सदा संतुष्टता का भाव होता है। जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है ऐसे ही मुनि अर्थात् स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति विषय-विकारों से अपनी इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है।
इससे पूर्व के एपिसोड में दीदी ने सबसे पहले पात्र परिचय कराकर विशाद योग में अर्जुन की मनोदशा व सांख्य योग में भगवान द्वारा अर्जुन को दिए आत्मा के ज्ञान के बारे में विस्तार से बताया। श्रृंखला में अगले रविवार को स्थितप्रज्ञ के तीसरे व अंतिम भाग के बारे में विस्तार से बताया जायेगा। गीता सर्वशास्त्रों में शिरोमणि है इसलिए अनेक लोग इस क्लास का ऑनलाइन लाभ ले रहे हैं। हर रविवार शाम 7.30 बजे फ्रीकांफ्रेन्सकॉल एप में इाउंदरनकपकप मीटिंग आईडी डालकर कोई भी जिज्ञासु इस कार्यक्रम का निःशुल्क लाभ ले सकते हैं।

प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

प्रतिदिन का सत्संग है परमशिक्षक की शिक्षा – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
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प्रतिदिन का सत्संग है परमशिक्षक की शिक्षा – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
सत्संग है सत्गुरू का दिया हुआ आईना
परमशिक्षक परमपिता परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षक
मनुष्यों में देवत्व के गुण धारण कराना परमात्मा का कार्य
टिकरापारा सेवाकेन्द्र में शिक्षक दिवस पर विशेष ऑनलाइन क्लास

बिलासपुर, टिकरापाराः- शिक्षक ऐसी पदवी है जिसे सारी दुनिया सम्मान देती है। हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने शिक्षकों के सम्मान में शिक्षक दिवस मनाने के लिए अपना जन्मदिन समर्पित कर दिया। उनके द्वारा कहे गए शब्द कि ‘राष्ट्र का निर्माण क्लास रूम में होता है’ इसका अर्थ है कि एक शिक्षक अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले अपने सच्चे ज्ञान से एक राष्ट्र का निर्माण करता है। भारत में जैसे-जैसे शिक्षा का विकास हुआ, मनुष्य के जीवन की रौनक ही बदल गई। शिक्षक न हो तो पढ़ाए कौन? राह कौन दिखाए? चित्त के अंधकार को कौन दूर करे? परमशिक्षक परमात्मा शिवबाबा संगमयुग पर आकर अपनी अमूल्य शिक्षाओं से हमारे जीवन को आकार देकर हमारा स्वरूप बना रहे हैं और नवयुग निर्माण का कार्य कर रहे हैं। प्रतिदिन प्रवचन, सत्संग, गीता पाठ, ज्ञान मुरली के माध्यम से रोज-रोज हमें शिक्षा देते हैं, एक भी दिन मिस नहीं करते और दिव्य गुणों को हममें भरकर हमको लायक बना रहे हैं। हमारे न समझने पर भी हम पर प्यार ही लुटाते हैं। वे हमें सत्संग के रूप में एक आइना देते हैं जिससे हम अपनी बुराईयों को दूर कर सद्गुणों का श्रृंगार करते हैं। ये श्रेष्ठ कार्य परमात्मा के अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता। जीवन में शिक्षक के अतिरिक्त वक्त या परिस्थितियां भी हमें बहुत कुछ सिखाती हैं लेकिन शिक्षक हमें सिखाकर इम्तहान लेते हैं और वक्त या परिस्थितियां इम्तहान लेकर हमें सिखाते हैं।
उक्त बातें शनिवार शाम शिक्षक दिवस के अवसर पर ऑनलाइन संबोधित करते हुए टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने आज के समय में विशेष कर कक्षा पांच तक के शिक्षकों से अनुरोध करते हुए कहा कि बच्चों को केवल अच्छे अंक लाना ही न सिखाएं बल्कि उनके अंदर महान व्यक्ति बनने का भाव भी भरें क्योंकि इस उम्र तक बच्चों के चेतन मन में ज्यादा कुछ भरा नहीं होता और अवचेतन मन बहुत ही क्रियाशील होता है। केवल किताबी शिक्षा नहीं बल्कि शिक्षक का जीवन ही ऐसा हो जिससे बच्चे कुछ सीखें। इसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण भी इसी तरह दिया जाय। बच्चों को महान बनाने के लिए क्रोध की नहीं अपितु सच्चे प्रेम की शक्ति चाहिए क्योंकि क्रोध से बच्चे डर जाते हैं और डर से उनके ब्रेन का विकास नहीं हो पाता। शिक्षकों को व्यसन आदि बुराईयों से मुक्त होना चाहिए, क्योंकि बच्चे अबोध नहीं होते वे सभी चीजें पकड़ते हैं। शिक्षक का कर्म ऐसा हो जो बच्चों के लिए श्रेष्ठ भावना उत्पन्न हो जाए ये भावना ही बच्चों की ग्रहण शक्ति बढ़ा देगी। उनका साहस बढ़ाने व प्रशंसा करने से उनकी बौद्धिक के साथ चारित्रिक, नैतिक व आध्यात्मिक विकास भी होता रहेगा। क्लास के अंत में दीदी ने मेडिटेशन की अनुभूति कराई और जीवन की हर प्राप्तियों के लिए उस परमशिक्षक परमपिता परमात्मा का धन्यवाद किया।

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गणेष जी के गुणों व शक्तियों को अपनाने के संकल्प के साथ करें विसर्जन – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
गणेष जी के गुणों व शक्तियों को अपनाने के संकल्प के साथ करें विसर्जन – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ऑनलाइन क्लास में गणेश जी के आध्यात्मिक रहस्य पर डाला प्रकाष
बहनों ने मोदक बनाकर गणेष जी को लगाया भोग

बिलासपुर, टिकरापाराः- भारत देश के त्यौहार यहां की संस्कृति की विशेषता है। भारत की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के कारण यह दुनिया के लिए आकर्षण का केन्द्र है और इसी वजह से इसे आध्यात्मिक गुरू या विश्व गुरू का दर्जा दिया गया है, जिसने दुनिया की सोच को एक नई दिशा दी है। हर त्यौहार के पीछे जीवन के गहरे सिद्धांत छिपे हैं, परन्तु समय के साथ लोग इनके आध्यात्मिक रहस्य को भूल गए और वह मात्र परम्पराएं बनकर रह गईं। टिकरापारा सेवाकेन्द्र में प्रतिदिन चल रहे ऑनलाइन सत्संग में सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने आज गणेश जी के विचित्र चित्र की अद्भूत कहानी सुनाई, विशेष गुण और शक्ति का प्रतीक हर अंग और अलंकरण के बारे में बताया और कैसे हम भी परमात्मा से संबंध जोड़कर उन गुणों व शक्तियों को अपने भीतर समाकर जीवन के विघ्नों पर विजय पा सकते हैं, इसकी भी जानकारी दी। सभी से यह अनुरोध भी किया कि यदि गणेश उत्सव को सार्थक बनाना है तो विसर्जन के साथ हमें गणेश जी की विशेषताओं को धारण करने का संकल्प भी लेना होगा।
दीदी ने गजधर गणपति के बड़े कान, चौड़ा माथा, छोटी आंखे, लंबी सूण्ड, छोटा मुंह, बड़ा पेट, एक दांत, चूहे की सवारी, उनके हाथों के अलंकार- कुल्हाड़ी, रस्सी, मोदक और वरद् हस्त के आध्यात्मिक रहस्यों को बताते हुए कहा कि उनका भव्य मस्तक बुद्धि की विशालता और विवेकशीलता का, बड़े कान उनके श्रवण का अर्थात् कम बोलने व अधिक सुनने का, छोटी आंख एकाग्रता का, एकदन्त बुराईयों को मिटाने व अच्छाइयों को धारण करने का, सूण्ड कार्यकुशलता व स्वयं को मोल्ड करने का प्रतीक है। जैसे हाथी को कुछ भी मिलता है तो वह महावत को समर्पित कर देता है उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन के मान-सम्मान, सभी प्राप्तियों को परमात्मा को समर्पित कर मान की इच्छा से परे निर्मान भाव के साथ रहना चाहिए। बड़ा पेट समाने की शक्ति की प्रेरणा देता है कि हम परिवार में एक-दूसरे की बातों को सहन करें व समा लें। चूहे की सवारी अर्थात् विकारों पर विजय प्राप्त करने, कुल्हाड़ी का तात्पर्य सभी बंधनों को काटने से है अर्थात् आध्यात्मिकता को अपनाने में जो भी देह, पदार्थ, व्यक्ति, वैभव के विघ्न आते हैं उस पर जीत प्राप्त करना। रस्सी अनुशासन में रहने, लड्डू व मोदक मुदित भाव में रहने की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर गणेश जी के निमित्त बहनों ने मोदक बनाकर भोग लगाया। अंत में सभी बहनें देवा श्री गणेशा गीत पर तालियां बजाकर झूम उठे।

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दादीजी का मूलमंत्र – निमित्त, निर्मान व निर्मल वाणी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाशनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
दादीजी का मूलमंत्र – निमित्त, निर्मान व निर्मल वाणी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ब्रह्माकुमारीज़ की भूतपूर्व मुख्य प्रशासिका दादी प्रकाशमणि जी की 13वीं पुण्यतिथि मनाई गई।
बहनों ने दादी को अपने स्मृति रूपी पुष्पों से दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि
दादी की स्मृति पर बनाए गए प्रकाश स्तम्भ को सम्मुख रख उनकी शिक्षाओं को किया याद

बिलासपुर, टिकरापाराः- प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईष्वरीय विष्व विद्यालय की भूतपूर्व मुख्य प्रशासिका आदरणीया राजयोगिनी दादी प्रकाशमणी जी की 13वीं पुण्यतिथि मनाई गई। इस अवसर पर दादी जी को भोग लगाया गया। माउण्ट आबू में स्थित दादी की यादगार में बने प्रकाशस्तम्भ का प्रतिरूप सेवाकेन्द्र में भी बनाया गया है। जिसमें दादीजी की शिक्षाएं भी लिखी हुई हैं। ब्र.कु. मंजू दीदी जी एवं अन्य बहनों ने स्मृतियों रूपी पुष्पों से दादी जी को श्रद्धांजलि दी एवं उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को धारण किया।
टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने दादीजी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दादीजी मातृवात्सल्य की धनी रहीं। संस्था के साकार संस्थापक पिताश्री ब्रह्माबाबा ने 1969 में संस्था की बागडोर उन्हें सौंपी। दादीजी जी ने इस संस्था को परिवार की तरह सम्भाला। लगभग 38 वर्षों के उनके नेतृत्व व कुशल मार्गदर्शन में संस्था के द्वारा परमात्म संदेश को केवल भारत ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों तक पहुंचाया गया। उनके अंदर सभी के प्रति समभाव था, कभी किसी के प्रति किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं था। विश्व में शांति की स्थापना के उनके अथक प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें शान्तिदूत पुरस्कार से सम्मानित किया।
दीदी ने बतलाया कि दादी जी की पुण्यतिथि को विश्व-बंधुत्व दिवस के रूप में मनाया जाता है। दादी जी कर्मयोगी थीं उनके जीवन की मूल शिक्षा यही थी कि – निमित्त भाव, निर्मान स्वभाव व निर्मल वाणी। सदा आत्मा के स्वमान में रहो और सबको सम्मान दो।
स्मृति-वन के निकट राजकिशोर नगर स्थित शिव-अनुराग भवन में भी ब्र.कु. रूपा बहन व शशी बहन ने दादी जी को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये।

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भ्राता सम्पादक महोदय,
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