हम स्वयं ही होते हैं अपनी सफलता में बाधक – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाषनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
हम स्वयं ही होते हैं अपनी सफलता में बाधक – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
व्यर्थ व अनावष्यक बातों को पकड़े रहने से मन हो जाता है पैरालाइज़्ड
स्वयं का स्वयं के साथ रिष्ता सबसे महत्वपूर्ण रिष्ता
ज्ञान यज्ञ है सभी यज्ञों में श्रेष्ठ
मन के विज्ञान का परमशास्त्र : गीता – वेब सीरिज़ का ग्यारहवां सप्ताह
गीता के चौथे अध्याय-ज्ञान योग का आज समापन

बिलासपुर, टिकरापाराः- भगवान ने कलियुग के अंत के लक्षण बताए हैं कि जब गाय विष्ठा में मुख डाले, अनाज पैकेटों में व दूध बोतलों में बिकने लगे, कन्या अपने मुख से वर मांगने लगे, एक कुंआ चार कुंओं को भर ले किन्तु चार कुंएं एक कुंए को न भर सके अर्थात् एक मात-पिता अपने चार बच्चों को संभाल ले किन्तु चार बच्चे मिलकर अपने मात-पिता को न संभाल सके तब समझना कि कलियुग के अंत का समय नजदीक है और परमात्मा के आने का समय हो चुका है। ये सभी लक्षण आज प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे हैं। अर्थात् परमात्म अवतरण की वेला चल रही है यही काल पुरूषोत्तम संगमयुग कहलाता है। जैसे हर तीन वर्ष में एक बार अधिक मास आता है जिसका बहुत महत्व है उसी प्रकार पूरे कल्प में इस पुरूषोत्तम संगमयुग का महत्व है। इस धरा पर अवतरित हुए परमात्मा को तत्वज्ञानी आत्मा का अनुभव करने वाले ज्ञानीजन ही पहचान पाते हैं। और इन्हीं तत्वदर्शी ज्ञानी महात्माओं के द्वारा अन्य लोग परमात्म तत्व का उपदेश सुनेंगे।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के ग्यारहवें सप्ताह में साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने यज्ञ के संबंध में अर्जुन के द्वारा भगवान से पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताते हुए कहा कि ज्ञान यज्ञ सर्व यज्ञों में श्रेष्ठ है, यह परमकल्याणकारी है, इसमें आत्मा का शुद्धिकरण होता है, महान पाप आत्माएं भी संसार सागर को पार कर लेती हैं जिस प्रकार अग्नि इंर्धन को भस्म कर देती है उसी प्रकार ज्ञान सर्व विकर्मों को भस्म कर देता है, साधनों की आसक्ति और मोह को समाप्त कर देता है।
द्रव्य यज्ञ करने वाले अनेक होते हैं इसमें सांसारिक वस्तुओं की प्रधानता होती है। अग्नि में विभिन्न सामग्री डालकर हवन करना, दान देना, परोपकार के लिए कुंआ, स्कूल, धर्मशाला, हॉस्पीटल आदि बनवाना – ये सभी द्रव्य यज्ञ के अंतर्गत आते हैं। इससे भिन्न कोई साधक अपने विवेक, विचार और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रयोग कर शुभ कर्म को ज्ञान के अधिकार के साथ प्रयोग करता है अतःज्ञान यज्ञ सर्व यज्ञों में श्रेष्ठ है।
विभिन्न परिस्थितियों का निदान इस गीता ज्ञान यज्ञ से होता है। स्वामी विवेकानंद जी का उदाहरण देते हुए आपने कहा कि स्वामी जी के विदेश प्रवास के दौरान एक विदेशी महिला ने स्वामी विवेकानंद जी से उनके समान पुत्र की चाहना की अर्थात् विवाह का प्रस्ताव रखा तब स्वामी विवेकानंद ने अपने संयम व विवेक के आधार पर उन्हें मां संबोधित करते हुए कहा कि वे उन्हें ही अपना बेटा स्वीकार कर ले।
जिस प्रकार हल्की से हल्की चीज को भी बहुत देर तक पकड़े रहने से हाथों को तकलीफ होती है या पैरालाइज़्ड भी हो सकता है उसी प्रकार व्यर्थ विचारों या बातों से मन की भी पीड़ा बढ़ जाती है या पैरालाइज़्ड हो जाता है अर्थात् डिप्रेशन की स्थिति आ जाती है। इसलिए बुद्धि को तेज करने व उसकी क्षमता को बढ़ाने के लिए सकारात्मक व ज्ञानयुक्त बातें ही करनी चाहिए। इसलिए भगवान ने अर्जुन को ज्ञानयुक्त विवेक की तलवार से अज्ञानजनित संशय का नाश कर युद्ध करने के लिए तैयार हो जाने की बात कही अर्थात् कर्मयोगी बनने की सलाह देते हुए चौथे अध्याय का उपसंहार किया।
एक अन्य कहानी के माध्यम से आपने बताया कि आप ही एक व्यक्ति हैं जो अपने उन्नति की सीमा निर्धारित कर सकते हैं, अपने जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं, अपनी खुशी, ज्ञान व सफलता को प्रभावित कर सकते हैं, केवल आप ही अपनी मदद कर सकते हैं। ये सोचना गलत है कि लोग बदलेंगे या दुनिया बदल जायेगी तो आपका जीवन बदलेगा बल्कि आपका जीवन तब बदलता है जब आपमें परिवर्तन आता है। अपने जीवन के जिम्मेवार आप ही हैं। अपनी जांच करें, दूसरों के सामने अपने को अच्छी तरह संभालें, कठिनाईयों, असंभव और नुकसान से डरें नहीं, एक विजेता बनें और अपनी वास्तविकता का निर्माण करें।
प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)