सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण बनाती है तुलसी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण बनाती है तुलसी – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में की गई तुलसी पूजा, बताया आध्यात्मिक रहस्य

टिकरापारा बिलासपुरः- जिस आंगन में बहुत सारे तुलसी के पौधे लगे होते हैं वहां कोई भी व्यक्ति प्रवेश करे तो उसे एक सकारात्मक ऊर्जा स्वतः ही अनुभव होती है किसी को कहने की आवश्यकता नहीं होती कि आप यहां सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करो, ये स्वतः ही अनुभव होती है। अधिक ऑक्सीजन प्रदान करने वाले पौधों में तुलसी के पौधे का विशेष स्थान है। जिनके यहां तुलसी का पौधा नहीं वे बाजार से तुलसी का सत्व लेकर प्रयोग करते हैं क्योंकि ये विशेष आयुर्वेदिक महत्व रखता है। इसका विशेष कार्य शुद्धिकरण है जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
उक्त बातें तुलसी-विवाह, देवउठनी एकादशी के अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में इस त्योहार का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। दीदी ने बताया कि रोज प्रातः 3-4 पत्ते तुलसी के सेवन करने से शरीर निरोग रहता है। ये हमारी प्राचीन संस्कृति का पौधा है।
हमारी संस्कृति के त्यौहार मौसम के अनुकूल खानपान की स्मृति दिलाते हैं….
दीदी ने बताया कि मौसम परिवर्तन के साथ यह त्योहार हमें खानपान में परिवर्तन की स्मृति दिलाते हैं। इस दिन पूजा में प्रयोग किये जाने वाले आंवला, बेर, सिंघाड़ा, चना-बूट, गन्ना, शकरकन्द आदि सभी विभिन्न विटामिन्स, प्रोटीन्स, मिनरल्स, फाइबर्स व अन्य पोषक तत्वों के स्रोत हैं।
तुलसी पवित्रता की व शालिग्राम पारसबुद्धि का प्रतीक – ब्र.कु. ईष्वरी
इस पर्व पर आने वाले वाली वृन्दा और जलन्धर की कथा सुनाते हुए सेवाकेन्द्र की बहन ब्र.कु. ईश्वरी ने बताया कि तुलसी पवित्रता का प्रतीक है क्योंकि वृन्दा एक पतिव्रता स्त्री थी और उनके पवित्रता की उत्पत्ति के रूप में तुलसी के पौधे को बताया गया है। तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ हुआ अर्थात् जब हम पवित्रता को धारण करते हैं व भगवान को याद करते हैं तो हमारी बुद्धि पत्थर से पारस बन जाती है। यह कथा हमें यह भी शिक्षा देती है कि जिस प्रकार के कर्म का बीज हम बोयेंगे वैसा ही फल हमें मिलेगा। ईर्ष्या करना व किसी के बारे में बुरा सोंचना जैसे दुर्गुणों से ऊपर उठकर सत्कर्म करने की प्रेरणा यह कथा हमें देती है।
इस अवसर पर सेवाकेन्द्र में गन्ने के मण्डप में तुलसी का पौधा सजाया गया व तुलसी-विवाह की पूजा में सेवाकेन्द्र से जुड़ी हुई माताएं शामिल हुईं।

प्रति,
माननीय संपादक महोदय,
दैनिक………………………….
बिलासपुर, छ.ग.

औषधीय, आध्यात्मिक व प्राकृतिक महत्व का पौधा है आंवला – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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औषधीय, आध्यात्मिक व प्राकृतिक महत्व का पौधा है आंवला – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
बेल व तुलसी के समान गुणकारी होने से भगवान का प्रिय फल है आंवला

ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा मे मनाया गया आंवला नवमी का पर्व

टिकरापारा बिलासपुरः- आंवला अपने प्रभावशाली गुणों के कारण पूजन योग्य है। इसमें बेल व तुलसी के पौधे के समान गुण होने से यह भगवान का प्रिय फल भी है। इसमें विटामिन-सी होने से यह बहुत गुणकारी व शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। प्रकृति परमात्मा की सुंदर रचना है जिसमें सभी पौधे चाहे वह पुष्पीय हों, औषधीय हों, फल देने वाले हों मिलकर प्रकृति को श्रेष्ठ बनाते हैं। सतयुग-त्रेतायुग में भी इनका विशेष महत्व है इसलिए इनका सेवन करने से निरोगी काया की प्राप्ति होती है।
उक्त बातें आंवला नवमी के अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र के आनंद वाटिका प्रांगण में आंवले के पौधे का औषधीय, आध्यात्मिक व प्राकृतिक महत्व बताते हुए ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। इस अवसर पर राजकिशोरनगर, मस्तूरी, नरियरा, बलौदा आदि सेवाकेन्द्र की बहनें भी उपस्थित रहीं। सभी ने आंवला सहित समस्त प्रकृति का वंदन किया और उन्हें अपनी शुभ भावनाओं के प्रकम्पन्न दिए। भगवान को भोग लगाया गया और अंत में सभी ने प्रसाद ग्रहण किया।
दीदी ने जानकारी दी कि आज शाम के ऑनलाइन सत्र में ‘‘आंवला नवमी का आध्यात्मिक रहस्य’’ विषय पर ब्रह्माकुमारी पाठशाला नरियरा की प्रभारी ब्र.कु. ज्ञाना बहन संबोधित करेंगी।प्रति,
माननीय संपादक महोदय,
दैनिक………………………….
बिलासपुर, छ.ग.

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औषधीय, आध्यात्मिक व प्राकृतिक महत्व का पौधा है आंवला – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
बेल व तुलसी के समान गुणकारी होने से भगवान का प्रिय फल है आंवला

ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा मे मनाया गया आंवला नवमी का पर्व
टिकरापारा बिलासपुरः- आंवला अपने प्रभावशाली गुणों के कारण पूजन योग्य है। इसमें बेल व तुलसी के पौधे के समान गुण होने से यह भगवान का प्रिय फल भी है। इसमें विटामिन-सी होने से यह बहुत गुणकारी व शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। प्रकृति परमात्मा की सुंदर रचना है जिसमें सभी पौधे चाहे वह पुष्पीय हों, औषधीय हों, फल देने वाले हों मिलकर प्रकृति को श्रेष्ठ बनाते हैं। सतयुग-त्रेतायुग में भी इनका विशेष महत्व है इसलिए इनका सेवन करने से निरोगी काया की प्राप्ति होती है।
उक्त बातें आंवला नवमी के अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र के आनंद वाटिका प्रांगण में आंवले के पौधे का औषधीय, आध्यात्मिक व प्राकृतिक महत्व बताते हुए ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने कही। इस अवसर पर राजकिशोरनगर, मस्तूरी, नरियरा, बलौदा आदि सेवाकेन्द्र की बहनें भी उपस्थित रहीं। सभी ने आंवला सहित समस्त प्रकृति का वंदन किया और उन्हें अपनी शुभ भावनाओं के प्रकम्पन्न दिए। भगवान को भोग लगाया गया और अंत में सभी ने प्रसाद ग्रहण किया।
दीदी ने जानकारी दी कि आज शाम के ऑनलाइन सत्र में ‘‘आंवला नवमी का आध्यात्मिक रहस्य’’ विषय पर ब्रह्माकुमारी पाठशाला नरियरा की प्रभारी ब्र.कु. ज्ञाना बहन संबोधित करेंगी।प्रति,
माननीय संपादक महोदय,
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प्रेस-विज्ञप्ति – भगवान हर संबंध से निभाते हैं हमारा साथ – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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भगवान हर संबंध से निभाते हैं हमारा साथ  – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ग्रामवासी भाई-बहनों के साथ भाई-दूज व दीवाली स्नेह मिलन कार्यक्रम का आयोजन
छत्तीसगढ़ी में मंजू दीदी व रूपा बहन ने दिया व्याख्यान

https://youtu.be/r5dyXbLpMgI

बिलासपुर टिकरापारा :- भगवान हर संबंध से हमारा साथ निभाते हैं। आवश्यकता है उनसे अपना संबंध जोड़़ने की। हम भक्ति करते यह गीत गाते तो हैं कि त्वमेव माताष्च पिता त्वमेव…। लेकिन अंदर स्वयं का परीक्षण करें कि क्या वाकई हमने भगवान को सर्व संबंधों से याद किया है। ज्यादातर हम भक्त और भगवान के संबंध से उनको याद करते हैं। लेकिन यदि भगवान का साथ चाहिए तो हमें उन्हें माता, पिता, भाई, दोस्त, संतान, गुरू आदि सभी संबंध जोड़कर उन्हें याद करना होगा।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र में ग्रामवासी भाई-बहनों के लिए आयोजित दीपावली व भाई-दूज स्नेह मिलन कार्यक्रम में आसपास के गांव से आए हुए साधकों को संबोधित करते हुए टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजूदीदी जी ने कही। आपने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि भगवान को भाई के रूप में याद करने से सुरक्षा का अनुभव होता है।
सहयोग षक्ति से होगी विष्व में शान्ति की स्थापना…ब्र.कु. रूपा बहन
दीवाली के पांचों दिनों का महत्व छत्तीसगढ़ी भाषा में बताते हुए राजकिशोरनगर सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. रूपा बहन ने कहा कि हम भगवान के आगे जो कहते हैं कि तन-मन-धन सब कुछ तेरा, तेरा तुझको अर्पण, इसे सार्थक करना ही वास्तविक धनतेरस है क्योंकि ये शब्द तो हम कह देते लेकिन मन के अंदर मैं पन, मेरापन रहता है। सब कुछ भगवान का दिया हुआ मानकर उपभोग व उपयोग करेंगे तो चिंता व तनाव से मुक्त हल्के रहेंगे।
नर्क में जाने से बचने के लिए शरीर की सुंदरता नहीं आत्मा की सुंदरता का खयाल रखना जरूरी है अर्थात् मन-बुद्धि अंदर-बाहर से साफ हो और जिसका मन साफ होता है वहीं सर्व प्राप्ति होती है, मां लक्ष्मी का वास होता है और सच्ची दीवाली मनती है। गोवर्धन पूजा अहंकार न करने, नारी का सम्मान करने, अच्छी दृष्टि रखने व अच्छे कार्यों में सहयोग देने का संदेश देता है। सहयोग शक्ति से कलयुग रूपी दुख का पहाड़ उठ जाएगा और विश्व में शान्ति स्थापित हो जाएगी।
इस अवसर पर सेवाकेन्द्र की बहन ब्रह्माकुमारी नीता ने ‘दीपावली मनायी सुहानी…’ गीत पर व गौरी बहन ने ‘आज उनसे मिलना है हमें…’ गीत पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। अंत में गांव से पधारे सभी भाई-बहनों को तिलक लगाकर प्रसाद दिया गया।
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

सकारात्मक सोच के साथ करें हर कार्य – ब्र.कु. मंजू दीदी

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सकारात्मक सोच के साथ करें हर कार्य – ब्र.कु. मंजू दीदी
किसी भी तकलीफ में मन को सकारात्मक बनाना सबसे पहला कार्य हो…

‘बढ़ते कदम स्वास्थ्य की ओर’ निःषुल्क ऑनलाइन स्वास्थ्य शिविर का पहला दिन

बिलासपुर टिकरापारा :- हम दिनभर में बहुत से कार्य करते हैं चाहे वह आसन-प्राणायाम हो, कर्मक्षेत्र पर कोई निर्णय लेने का कार्य हो, भोजन करना, कार्यालयीन कार्य या अन्य कोई भी कार्य हो, हमें उस कार्य को करने से पहले मन में उस कार्य के प्रति सकारात्मक भाव लाना जरूरी है। आधी सफलता तो सकारात्मक सोच से ही मिल जाती है क्योंकि आधार मजबूत हो जाता है। हम शारीरिक या मानसिक तकलीफ में जो विधि अपनाते हैं उसमें परिवर्तन की आवश्यकता है। किसी भी रोग के लिए सबसे पहले सकारात्मक सोच के साथ राजयोग ध्यान, प्राणायाम, आसन, एक्यूप्रेषर, घरेलू चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा का प्रयोग करें। तत्पष्चात्  आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, एलोपैथिक इलाज को रखें। ज्यादातर यही होता है कि हम कुछ भी छोटी-मोटी बीमारी के लिए दवाइयां ले लेते हैं। इससे रोग प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है। जबकि हमारे किचन में या हमारे आसपास ही ऐसे उपाय होते हैं जिससे वह हल्की-फुल्की बीमारियां दूर कर सकते हैं। हालांकि एक्सीडेंटल केस व इमरजेंसी चिकित्सा के लिए एलोपैथी चिकित्सा ही सर्वोत्तम है।
उक्त बातें सोशल मीडिया के माध्यम से ऑनलाइन स्वास्थ्य शिविर – ‘बढ़ते कदम स्वास्थ्य की ओर’ को संबोधित करते हुए ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने आज नए साधकों के अनुसार भस्रिका, कपालभाति एवं अनुलोम प्राणायाम की विधि सिखाई और कहा कि किसी भी अन्य प्राणायामों के समय न मिले तो कम से कम कपालभाति व अनुलोम-विलोम प्राणायाम के लिए 15 से 20 मिनट जरूर समय निकालें। भोजन के आधे एक घण्टे के पश्चात् आप भस्रिका व अनुलोम-विलोम प्राणायाम कर सकते हैंव वज्रासन में बैठ सकते हैं बाकी अन्य आसन व प्राणायाम खाली पेट ही करें। अभ्यास करते समय खांसी, छींक आदि शरीर के किसी भी प्रकार के वेग को न रोकें।
आज कार्यक्रम का शुभारम्भ बहनों ने दीप प्रज्ज्वलन करके किया। आसनों के अभ्यास के प्रदर्शन के लिए दीदी जी के साथ मास्टर योग प्रशिक्षक बी.के. पूर्णिमा बहन व राकेश भाई उपस्थित रहे।
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

अज्ञान नींद से जागने का संदेश देती है कोजागर पूर्णिमा – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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प्रेस-विज्ञप्ति 1
अज्ञान नींद से जागने का संदेश देती है कोजागर पूर्णिमा – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
शरद पूर्णिमा का आध्यात्म, आयुर्वेद, विज्ञान व संस्कृति में भी महत्व है…

चांद की 16 कलाएं, पवित्रता की दुनिया लाने का देती है संदेश
टिकरापारा सेवाकेन्द्र में बहनों ने मनाया शरद पूर्णिमा का पर्व, खीर बनायी और रास किया
ब्रह्ममुहूर्त में खुले आसमान के नीचे सामूहिक योग साधना की

बिलासपुर टिकरापारा :- प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईष्वरीय विश्व विद्यालय टिकरापारा सेवाकेन्द्र में बहनों ने बड़े उत्साह के साथ शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया। शुक्रवार की रात को खीर बनाकर परमात्मा को भोग लगाया गया। तथा श्रीकृष्ण व षिव के गीतों पर सभी बहनों ने गरबा रास किया। साथ ही आज ब्रह्ममुहूर्त में खुले आसमान के नीचे खीर रखकर योग साधना भी की। सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी ने रात्रि ऑनलाइन क्लास में पर्व का आध्यात्मिक रहस्य बताया।
दीदी ने बताया कि शरद पूर्णिमा को कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है। कहते हैं कि इस रात को मां लक्ष्मी जी भ्रमण के लिए निकलती हैं लेकिन मां लक्ष्मी की कृपा उन्हीं पर होती है जो जागता है। किन्तु वास्तव में कृपा तो उन पर होती है जो अज्ञानता, आलस्य व अलबेलेपन की नींद से जाग गया हो क्योंकि जागरण तो चोर, गलत कर्म करने वाले भी करते हैं।
मिट्टी या चांदी के बर्तन में पकाएं खीर…
खीर पकाने से पहले हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि बर्तन मिट्टी या चांदी का होना चाहिए और खीर को चांद के प्रकाश में रखते समय उसकी स्वच्छता का भी ख्याल करें कि कहीं कीड़े-मकोड़े न लगे या बिल्ली आदि उसे झूठा न कर दे। मिट्टी या चांदी के बर्तन में रखने का आयुर्वेदिक महत्व है क्योंकि ये खीर खाने से श्वांस के रोगियों को लाभ मिलता है और तुतलाकर बोलने वाले बच्चों की वाणी में मिठास व प्रबलता आती है। साथ ही यह पित्त के प्रभाव को भी कम करता है।
इस दिन चंद्रमा अपने चरम सौन्दर्य में रहता है। इसलिए सुंदरता के लिए चांद की उपमा दी जाती है। चांद शीतलता का प्रतीक है। चांद की 16 कलाएं आत्मा की पवित्रता की बात है जब तक हम पवित्रता को प्राप्त नहीं करते तब तक हम अमृत तत्व को प्राप्त नहीं कर सकते और नई दुनिया का स्वागत भी नहीं कर सकते। चंद्रमा मन का स्वामी भी होता है यह हमें संसार में न अटकाए इसलिए सभी ईश्वर स्तुति, भजन आदि कर रात्रि जागरण करते हैं। सफेद वस्त्र पहनना पवित्रता, शीतलता व वैराग्य का प्रतीक है। भगवान शिव या श्रीकृष्ण को गुलाब का फूल भी अर्पित करते हैं क्योंकि गुलाब में रंग, रूप और खुशबू होती है जो हमें ज्ञान का रंग, योग की खुशबू और धारणाओं का रूप अपनाने को प्रेरित करती है।
प्रेस-विज्ञप्ति 2
‘बढ़ते कदम स्वास्थ्य की ओर’ निःषुल्क ऑनलाइन स्वास्थ्य षिविर का आयोजन 01 नवम्बर से

आसन-प्राणायाम के साथ ध्यान व सकारात्मक चिंतन की भी होगी क्लास
छ.ग.योग आयोग की पूर्व सदस्या ब्र.कु. मंजू दीदी जी एवं अन्य अनुभवी प्रषिक्षक सिखायेंगे योग

बिलासपुर टिकरापारा :- कोरोना काल में लोगों के शारीरिक व मानसिक सषक्तिकरण तथा रोगप्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि करने के उद्देष्य से ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा द्वारा विभिन्न ऑनलाइन कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं जो कि पूर्णतः निःषुल्क हैं। प्रतिदिन यूट्यूब व फ्रीकान्फ्रेन्सकॉल एप के माध्यम से प्रसारित कार्यक्रमों में दिनचर्या की शुरूआत प्रातःकालीन ब्रह्ममुहूर्त में मेडिटेषन अनुभूति सत्र, प्रातः 7 से 8 बजे सत्संग, शाम 6.30 से 7.30 योग-साधना व शाम 7.30 बजे सकारात्मक चिंतन की क्लास प्रसारित हो रही हैं। इसी क्रम में आज एक नवम्बर छ.ग. स्थापना दिवस के दिन से प्रतिदिन प्रातः पौने छः से पौने सात बजे आसन-प्राणायाम व ध्यान का सत्र ‘बढ़ते कदम स्वास्थ्य की ओर’ शिविर का शुभारम्भ होने जा रहा है। जिसकी लिंक ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा के यूट्यूब चैनल पर जाकर कोई भी प्राप्त कर सकता है।
दीदी ने तीन अंतर्राष्ट्रीय योग गुरूओं स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी, स्वामी रामदेव बाबा और महर्षि महेश योगी जी से प्रशिक्षण प्राप्त किया है जिनसे सीखी हुई योग की बारीकियों और अपने जीवन के अनुभवों को वे शिविर के दौरान साझा करेंगी। नए साधकों के अनुसार योग के सभी पदों को विधिवत् क्रमबद्ध तरीके से बताया जायेगा। मास्टर योग प्रशिक्षकों के द्वारा यौगिक जॉगिंग एवं अन्य कठिन आसन सीखाये जायेंगे।
भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

लिंक : शरद पुर्णिमा का आध्यात्मिक रहस्य
01 नवम्बर प्रातः 5.45 योग शिविर की आगामी लिंक

प्रेस-विज्ञप्ति – सही विधि से योग करने पर मिलेगा लाभ – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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प्रेस-विज्ञप्ति
सही विधि से योग करने पर मिलेगा लाभ – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
भारत स्वाभिमान द्वारा आयोजित 28 दिवसीय राज्य स्तरीय सह योग प्रशिक्षण शिविर का आज 16वां दिन
दीदी ने प्रायोगिक योग सत्र का ऑनलाइन संचालन किया व विशेष योगनिद्रा का कराया अभ्यास

बिलासपुर टिकरापारा :- ‘‘योग आसन प्राणायाम करने वाले प्रारंभिक साधकों को योग का अभ्यास किसी अनुभवी प्रषिक्षक के सानिध्य में करना चाहिए नहीं तो हम बहुत समय से योग तो करते हैं परन्तु विधि सही न होने के कारण हमें लाभ प्राप्त नहीं होता। सही विधि के साथ सकारात्मक विचारों के साथ योग करना चाहिए। आसन-प्राणायाम तन को स्वस्थ रखता है वहीं सकारात्मक विचार मन व बुद्धि को दुरूस्त करता है।’’
उक्त बातें भारत स्वाभिमान न्यास द्वारा आयोजित 28 दिवसीय राज्य स्तरीय सह योग प्रशिक्षण कार्यक्रम के 16वें दिन ऑनलाइन प्रायोगिक योगाभ्यास कराते हुए ब्रह्माकुमारीज टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने सभी को समयबद्ध व क्रमबद्ध तरीके से आठों प्राणायाम, कुछ सूक्ष्मअभ्यास व अन्य आसनों के अभ्यास कराए। व साथ ही यह भी बताया कि आसनों का अभ्यास करने के तुरंत बाद बढ़ी हुई श्वांस की गति में प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। पहले श्वांसों की गति को सामान्य करें फिर अगले अभ्यास की ओर आगे बढ़ें।
मानसिक शांति व मन की थकान दूर करने के लिए करें योगनिद्रा का अभ्यास…
दो घण्टे के सत्र में आसन-प्राणायाम के बाद दीदी ने सभी को योगनिद्रा अर्थात् रिलैक्सेशन मेडिटेशन का अभ्यास कराया और कहा कि योगनिद्रा में लिया गया संकल्प अवश्य पूरा होता है अतः किसी श्रेष्ठ लक्ष्य के लिए संकल्पित होकर योगनिद्रा का अभ्यास करें। यदि हम सही तरीके से इसका अभ्यास करते हैं तो हमारी आठ घण्टे की थकान दूर हो जाती है। गूगल मीट व फेसबुक लाइव के माध्यम से जुड़े प्रशिक्षार्थियों ने इस सत्र का लाभ लिया। योग प्रदर्शन के लिए मास्टर ट्रेनर राकेश गुप्ता एवं कु. रानी दीपाली गंगोत्री मंजू दीदी जी के साथ उपस्थित रहे।

प्रेस-विज्ञप्ति 2
एकाग्रता व स्थिरता की अद्भूत मिसाल चैतन्य झांकी
टिकरापारा व राजकिषोरनगर में लगी चैतन्य झांकी का आज योग साधना के साथ हुआ समापन

‘‘टिकरापारा एवं राजकिषोर नगर के सेवाकेन्द्र में लगाए गए चैतन्य देवी की झांकी का आज अंतिम दिन रहा। जिसमें बहनों ने राजयोग के अभ्यास से तन व मन की स्थिरता द्वारा एकाग्रता की अद्भूत मिसाल प्रस्तुत की। वे मेडिटेषन में शक्तिस्वरूपा स्थिति में स्थित हो परमात्मा शिव से शक्ति लेकर पूरे विष्व को सकाश देती हैं अर्थात् अपनी शुभभावनाओं व शुभकामनाओं के प्रकम्पन्न भेजती हैं। अंतिम दिन बहनों ने मां के सजे-सजाए रूप के समक्ष भजनों के भाव में जाते हुए ईष्वरीय स्मृति में बैठकर योग साधना की।’’

भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

अंततः जीत सत्य की होती है – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

प्रेस-विज्ञप्ति
अंततः जीत सत्य की होती है – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
दस विकारों पर विजय प्राप्ति का पर्व है विजयादषमी
रावण दस विकारों का व कुंभकरण आलस्य का प्रतीक है…
ऑनलाइन सत्संग में बताया गया दशहरा का आध्यात्मिक रहस्य

बिलासपुर टिकरापारा :- आज बुराइयों रूपी रावण का वास हर घर में हो गया है। वर्तमान समय कई बार यह देखने में आता है कि असत्य और बुराई की जीत हो रही है और सत्य हारता हुआ प्रतीत होता है लेकिन वास्तविकता यह है कि असत्य या बुराई की जीत अल्पकालिक होती है। अंतिम जीत सत्य की ही होती है। परमात्म महावाक्य हैं कि सत्य की नाव हिलेगी-डूलेगी मगर डूब नहीं सकती तथा सत्य के सूर्य को असत्य के काले बादल ढ़ंक नहीं सकते। आज हम विजयादशमी के दिन अपनी किसी न किसी बुराई को छोड़ने का संकल्प अवश्य लें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तो पांच मुख्य विकार हैं ही परन्तु साथ ही आलस्य व अलबेलेपन को छठवें व सातवें विकार के रूप में बताया गया है। अपने कार्यों, लक्ष्य, पढ़ाई, जिम्मेदारी आदि के प्रति आलस्य व अलबेलेपन का त्याग करना आवश्यक है। अन्य विकारों में ईर्ष्या-द्वेष, नफरत व वैरभाव- ये सभी मुख्य दस विकार हैं जो रावण के दस शीशों के प्रतीक हैं।
उक्त बातें टिकरापारा में ऑनलाइन सत्संग में ‘विजयादशमी का आध्यात्मिक रहस्य’ विषय पर साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुंमारी मंजू दीदी जी ने कही।
रावण को जलाने के साथ राम से प्रीत भी लगाएं…
दीदी ने बताया कि हम हर वर्ष रावण दहन के साथ अपनी कुछ बुराईयों को छोड़ने का संकल्प लेते तो हैं किन्तु वह दोबारा हममें प्रवेश कर जाता है क्योंकि हम रावण तो जला लेते हैं लेकिन अपने मन-बुद्धि की प्रीत परमात्मा के साथ नहीं जोड़ते जिससे हमारी बुद्धि सत्संग को छोड़ कुसंग की ओर चली जाती है और बुराईयां हमारे अंदर प्रवेश कर जाती हैं। रामायण की चौपाइयों में चार राम की विवेचना की गई है – एक राम दशरथ के बेटे, दूसरा सभी मनुष्यों के अंदर स्थित आत्मा को भी राम की संज्ञा दी गई, साथ ही तीसरे राम के रूप में सभी जीव-जन्तुओं की आत्मा को भी राम कहा गया है किन्तु चौथे राम के लिए कहा जाता है कि वे इस जग से न्यारे हैं अर्थात् निराकार ज्योतिस्वरूप परमात्मा की महिमा की गई है जिसके लिए तुलसीदास जी ने बहुत सुंदर व्याख्या की है कि बिनु पग चलै, सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना, आनन रहत सकल रस भोगी, बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी…अतः सार यही है कि सत्संग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है।
सदा खुश रहें तो रावण को दोबारा जलाना नहीं पड़ेगा…
हमारे जीवन में यदि दुख या अशान्ति है तो कहीं न कहीं हमारे अंदर बुराइयों का वास है। हम दूसरों को बदलना तो चाहते हैं लेकिन खुद की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। इसलिए सदा खुश रहने के लिए दूसरों में बदलाव चाहने की अपेक्षा अपनी कमजोरियों को महसूस करते हुए उसे दूर करें। जब हम सदा प्रसन्न रहेंगे तो हमें बार-बार रावण दहन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
कुंभकरण घोर आलस्य व मेघनाथ क्रोध का प्रतीक…
विजयादशमी के दिन रावण के साथ कुंभकरण व मेघनाथ का भी पुतला जलाते हैं क्योंकि कुंभकरण आलस्य व मेघनाथ क्रोध व रोब का प्रतीक है जो कि विशेषकर युवाओं में देखने को मिलता है। सफलता प्राप्ति के लिए आलस्य को मारना जरूरी है और स्वयं को शीतल बनाकर अपने क्रोध व रोब की गरजना को समाप्त करना होगा…
चैतन्य देवी का दर्शन भी ऑनलाइन
टिकरापारा सेवाकेन्द्र के ज्ञानगंगा हॉल में चैतन्य देवी विराजित हैं। वैश्विक महामारी कोरोना को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन दर्शन को ही प्राथमिकता दी जा रही है।

भ्राता सम्पादक महोदय,
दैनिक………………………..
बिलासपुर (छ.ग.)

पतंजलि द्वारा आयोजित 28 दिवसीय राज्य स्तरीय सह योग प्रशिक्षण शिविर के चार सत्रों को ब्र.कु. मंजू दीदी ने किया संबोधित

सादर-प्रकाशनार्थ
प्रेस-विज्ञप्ति
भावनारहित मनुष्य को शान्ति व सुख नहीं मिल सकता।- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
पतंजलि द्वारा आयोजित 28 दिवसीय राज्य स्तरीय सह योग प्रशिक्षण शिविर के चार सत्रों को दीदी ने किया संबोधित

चार सत्रों में योग के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान देने के साथ योग की गहन अनुभूति कराई।

 

‘‘भक्ति का अर्थ है भावना। जिसके मन और इन्द्रिय वष में नहीं हैं तथा इन्द्रियों के भोगों में जिनकी आसक्ति होती है उनमें भावना नहीं होती और भाव रहित मनुष्य की बुद्धि का स्थिर रहना तो दूर, वह परमात्म स्वरूप का चिंतन भी नहीं कर सकता। परमात्म चिंतन न होने से मनुष्य का मन राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि से व्याकुल रहता है अतः शान्ति नहीं मिलती। जिससे सच्चे सुख की प्राप्ति भी नहीं होती है।
उक्त बातें पतंजलि योग समिति द्वारा आयोजित 28 दिवसीय राज्य स्तरीय सह योग प्रशिक्षण कार्यक्रम में ‘स्थितप्रज्ञ (स्थिरबुद्धि), नवधाभक्ति, भक्त के प्रकार व भक्तियोग विषय को गूगल मीट व फेसबुक लाइव के माध्यम से जुड़े साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए ब्रह्माकुमारीज टिकरापारा सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही।
ज्ञानयुक्त भक्ति ही श्रेष्ठ भक्ति…
आपने भक्त के चार प्रकार बताते हुए कहा कि शारीरिक कष्ट आने पर दुख दूर करने के लिए भगवान को याद करने वाले भक्त आर्त भक्त, भगवान को जानने की इच्छा रखने वाले जिज्ञासु भक्त, भोग, ऐश्वर्य और सुख प्राप्ति के लिए भगवान का भजन करने वाला अर्थार्थी भक्त और जो सदैव निष्काम होता है और भगवान को छोड़कर कुछ नहीं चाहता, वह ज्ञानी भक्त है। इन सभी में भगवान को ज्ञानी भक्त सबसे अधिक प्रिय हैं क्योंकि वह ज्ञान के साथ भक्ति करता है। इसलिए भगवान ने ज्ञानी को अपनी आत्मा कहा है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य सख्य और आत्मनिवेदन ये सभी शास्त्रों में वर्णित नवधा भक्ति के प्रकार हैं।
स्थिरबुद्धि के लिए कामनाओं व क्रोध पर नियंत्रण जरूरी…
मनुष्य की कामनाओं में विघ्न पड़ने से क्रोध की उत्पत्ति होती है और क्रोध से स्मृति, ज्ञान व बुद्धि का नाश हो जाता है जिससे व्यवहार में कटुता, कठोरता, कायरता, हिंसा, दीनता, मूढ़ता, जड़ता आदि दोष आ जाते हैं जो मनुष्य का पतन कर देते हैं। इसलिए कामना, क्रोध व अहंकार योगियों के महान शत्रु हैं इन्हें नियंत्रण किए बिना स्थिरबुद्धि नहीं बन सकते।
इस सत्र के अतिरिक्त दीदी ने प्राणायाम-आसन का प्रायोगिक सत्र भी लिया और आगे 27 अक्टूबर के प्रातःकालीन सत्र में योग-आसन के साथ विशेष रूप से योगनिद्रा का भी अभ्यास करायेंगी। उक्त कार्यक्रम के आयोजक के रूप में मुख्य रूप से छ.ग. योग आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं पतंजलि के मध्य भारत एवं नेपाल प्रभारी भ्राता संजय अग्रवाल जी एवं भारत स्वाभिमान न्यास, छ.ग. राज्य के प्रांतीय प्रभारी भ्राता देवीलाल पटेल जी भी शामिल रहे।

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नवरात्र पर मां से लें अष्ट शक्तियों व अष्ट अलंकारों की सौगात – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

सादर प्रकाशनार्थ
प्रेस विज्ञप्ति
नवरात्र पर मां से लें अष्ट शक्तियों व अष्ट अलंकारों की सौगात – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
ऑनलाइन सत्संग में नवरात्रि के आध्यात्मिक रहस्य पर डाला गया प्रकाष

चैतन्य देवी की झांकी भी सजाई गई
पूरे नौ दिन कर सकेंगे देवी के ऑनलाइन दर्शन

बिलासपुर, टिकरापाराः- प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के टिकरापारा शाखा द्वारा आज से प्रतिदिन सायं 7 बजे चैतन्य देवी की झांकी का आयोजन किया जा रहा है। पूरे नौ दिन चैतन्य देवी के दर्शन होंगे ब्रह्माकुमारीज़ के यूट्यूब चैनल पर लिंक प्राप्त कर देवी मां के ऑनलाइन दर्शन किये जा सकेंगे। सायंकालीन सत्संग के आज के सत्र में सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने नवरात्रि के आध्यात्मिक रहस्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अभी कलियुग के समय में हर आत्मा के अंदर एक युद्ध चल रहा है। किसी का धन के सशक्तिकरण को लेकर, किसी का संबंधों को लेकर, किसी का विकारों से संबंधित- ऐसे सबका युद्ध अपना-अपना है। जब हम शस्त्रों से सुसज्जित होंगे, तब ही युद्ध कर पायेंगे और विजयी बनेंगे। तो आइए इस नवरात्रि पर कुछ नवीनता करते हुए मां से अष्ट शक्तियों व अष्ट अलंकारों रूपी शस्त्रों की सौगात लें और उसे जीवन में अमल कर नवरात्रि पर्व को सार्थक करें। सौगात केवल लेना नहीं उसे अपनी दिनचर्या में शामिल भी करना है क्योंकि जैसे हमारे पास हथियार तो है लेकिन हमने उसे कहीं रख दिया है और दुश्मन आ गया तो विजयी नहीं बन पायेंगे।
दीदी ने बताया कि देवियों को आठ भुजाएं बतायी जाती हैं जो अष्ट शक्तियों की प्रतीक हैं। इन शक्तियों में सबसे पहली शक्ति सहनशक्ति है। रिश्तों में जितना सहन करेंगे उतने ही मजबूत बनेंगे। लोगों के संस्कारों को सहन करना है। सहन करते यह भी ध्यान रखना है कि हमारी शीतलता कहीं खो न जाए, नहीं तो कई बार ऐसा होता है कि हम सहन करते-करते बॉयल फ्रॉॅग की तरह हो जाते हैं और एक समय आता है कि हम ज्वालामुखी की तरह फट पड़ते हैं। हमें ध्यान रहे व्यक्तियों का सहन करना है और परिस्थितियों का सामना करना है। 2. दूसरी शक्ति है सामना करने की। यदि मन शक्तिशाली और सकारात्मक है तो बाह्य चुनौतियों व परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति आ जाती है। 3. परखने की शक्ति- कोई भी कार्य करने से पहले उसके फायदे व नुकसान को परखना जरूरी है और बुद्धि की एकाग्रता न होने व कमजोर विवेक के कारण परखने व निर्णय लेने में समय बहुत जाता है। 4. निर्णय करने की शक्ति- अपनी जिंदगी से जुड़े निर्णय आप स्वयं लें क्योंकि आपसे बेहतर आपको कोई और नहीं जान सकता है। 5. सहयोग शक्ति- घर में एक-दूसरे को सकारात्मक व शुभ भावनाओं के साथ सपोर्ट करें, आगे बढ़ने में मदद करें। जैसे एक-एक उंगली के सहयोग से गोवर्धन पहाड़ उठ गया था तो समस्या क्या बड़ी चीज है। 6. समाने की शक्ति- परिवार में एक-दूसरे की कमी-कमजोरियों को अपने अंदर समाने की आदत डालें फिर देखिए आपका घर स्वर्ग बन जाएगा। 7. विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति- व्यस्त होते हुए भी मन को सदा हल्के रखना, बिज़ी लाइफ होते भी स्वयं की इज़ी रखना। 8. समेटने की शक्ति- व्यर्थ विचारों से स्वयं को समेटकर अपने मन को पॉज़िटिव थॉट दें। इन सभी अष्ट शक्तियों को प्राप्त करने के लिए मां से वरदान लें और प्रतिदिन राजयोग मेडिटेशन और सत्संग जरूर करें।
अष्ट शक्तियां व अष्ट अलंकार एक-दूसरे के पूरक…
साथ ही दीदी ने मां के अष्ट अलंकारों का रहस्य भी बताया कि ज्ञान की तलवार, स्वयं के दर्शन का स्वदर्शन चक्र, अपने लक्ष्य को साधने के लिए तीरकमान, जीवन को न्यारा व प्यारा बनाने के लिए कमल फूल समान पवित्र जीवन, शारीरिक, मानसिक व आर्थिक तीन शूलों को नष्ट करने के लिए आध्यात्मिकता की शक्ति अर्थात् त्रिशुल, सदा सभी को प्यार, सम्मान, शुभभावना देने की भावना रूपी वरदानी हस्त, ज्ञान की गदा व ज्ञान का शंख- ये आठ अलंकार की सौगात सभी श्रद्धालुजन माता रानी से जरूर प्राप्त करें। ये सभी अष्ट अलंकार व अष्ट शक्तियां एक-दूसरे के पूरक हैं।
आज नवरात्रि के प्रथम दिन मां जगदम्बा के रूप में सेवाकेन्द्र की बहन ब्रह्माकुमारी श्यामा विराजित रहीं जो परमात्मा शिव से शक्ति ले पूरे विश्वभर की दुखी व अशांत आत्माओं को इमर्ज कर सकाश दे रही थीं अर्थात् सुख-शान्ति के प्रकम्पन्न फैला रही थीं।
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भ्राता सम्पादक महोदय,
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हमारे बोल सदा कल्याणकारी व वरदानी हों श्रापित करने वाले नहीं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

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प्रेस विज्ञप्ति
हमारे बोल सदा कल्याणकारी व वरदानी हों श्रापित करने वाले नहीं – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
व्यर्थ व अनावश्यक बातों को पकड़े रहने से मन हो जाता है पैरालाइज़्ड

गुरूवार विशेष ऑनलाइन सत्संग में वाणी की विषेषता विषय पर सुनाए गए महावाक्य

बिलासपुर, टिकरापाराः- व्यर्थ के बोल, विस्तार करने के बोल, समय बरबाद करने के बोल, अपनी कमजोरियों द्वारा दूसरों को संगदोष में लाने वाले बोल हमारी व दूसरों की ऊर्जा को नष्ट करते हैं। महान आत्माओं के हर बोल को महावाक्य कहा जाता है। महावाक्य अर्थात् महान बनाने वाले वाक्य। जैसे कोई बीज बहुत छोटा होता है लेकिन उसमें पूरा वृक्ष समाया होता है ऐसे ही हमारी वाणी में सार होना चाहिए। विश्व कल्याण में सहयोगी बनने के लिए हमारी वाणी शक्तियुक्त, स्नेहयुक्त, योगयुक्त, युक्तियुक्त, स्वमान व स्मृति को बढ़ाने वाली हो। ऐसे बोल के लिए ही कहते हैं ‘सत्य-वचन महाराज’।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में गुरूवार को ‘‘वाणी की विशेषता’’ विषय पर आयोजित वेबिनार को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने उदाहरण देकर बताया कि जैसे किसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हेतु कोई लेख लिखते हैं तो उसे लिखने के बाद फिर से चेक करते हैं कि ठीक और प्रभावशाली है या नहीं, जो लक्ष्य व टॉपिक है उसके अनुसार लिखा है या नहीं। ऐसे ही हमें भी अपने हर रोज प्रातःकाल से रात्रि तक के व्यवहार, मन, वाणी, कर्म को चेक करना चाहिए कि कितनी प्रभावशाली रही और कितनी व्यर्थ रही। अभी का रिज़ल्ट तो यही है कि ज्यादातर बोल साधारण व व्यर्थ ही होते हैं जो अकल्याण करने में सहभागी बन जाते हैं। इसलिए अपनी जिम्मेवारी और महत्व को समझ हर बोल पर अटेन्शन रखना होगा। किसी को श्रापित करने वाले बोल के बजाय वरदानी अर्थात् उमंग-उत्साह बढ़ाने व प्रगति कराने वाले बोल हों।
कोरोना से सुरक्षा के लिए इस वर्ष चैतन्य देवियों की झांकी का आयोजन स्थगित
मंजू दीदी जी ने जानकारी दी कि नवरात्र के अवसर पर पिछले 30 वर्षों से चैतन्य देवियों की झांकी का आयोजन किया जा रहा था और विशेष पिछले कुछ वर्षों से तो वृहद स्तर पर आयोजन किया जा रहा था जिसका लाभ हजारों भक्तगण प्राप्त करते थे। किन्तु इस वर्ष कोरोना काल में शासन व ब्रह्माकुमारीज़ मुख्यालय माउण्ट आबू के निर्देषानुसार दयालबंद में लगाई जाने वाली भव्य झांकी को स्थगित कर दिया गया है ताकि सामूहिक एकत्रीकरण न हो, कोरोना संक्रमण न बढ़े व सभी सुरक्षित रहें।

प्रति,
भ्राता सम्पादक महोदय,
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