Brahma Kumaris Raj Kishore Nagar
सफलता के लिए ‘सम्मिलित’ नहीं, ‘समर्पित’ होना आवश्यक – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी
*सफलता के लिए ‘सम्मिलित’ नहीं, ‘समर्पित’ होना आवश्यक – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी*
*- प्रभु दर्शन भवन में सद्गुरुवार विशेष आध्यात्मिक क्लास*
*- ‘सुख दो और सुख लो’ के मंत्र से मंजू दीदी ने सिखाई दिव्य जीवन की कला*
**टिकरापारा।** ब्रह्माकुमारीज़ के प्रभु दर्शन भवन, टिकरापारा में आयोजित सद्गुरुवार विशेष आध्यात्मिक क्लास में ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने ईश्वरीय महावाक्यों के माध्यम से भाई-बहनों को श्रेष्ठ जीवन जीने की कला सिखाई। उन्होंने कहा कि श्रीमत पर चलते हुए सबको सुख देना और सबसे सुख लेना ही वर्तमान समय का श्रेष्ठ पुरुषार्थ है।
मंजू दीदी ने कहा कि किसी भी कार्य में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति केवल उसमें “सम्मिलित” है या पूर्ण रूप से “समर्पित”। जब सेवा तन, मन और धन से समर्पित भाव से की जाती है, तब सफलता स्वतः निश्चित हो जाती है।
उन्होंने भाई-बहनों को स्मृति दिलाई कि “मैं आत्मा केवल निमित्त हूँ, वास्तविक करावनहार परमात्मा हैं।” इस भावना से कार्य करने पर देह-अभिमान और अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है तथा सेवा में हलकापन और आनंद का अनुभव होता है।
दीदी ने हाल ही में पालमपुर स्थित ‘कैलाश मानसरोवर’ केंद्र की यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वहां सेवा कर रहे भाई-बहनों की सरलता और योगयुक्त स्थिति सभी को आकर्षित करती है। उन्होंने कहा कि सादगी ही सच्ची सुंदरता है और हमें दिखावे के स्थान पर सरलता को जीवन में अपनाना चाहिए।
क्लास के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि दूसरों के अच्छे कार्यों की प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए, लेकिन स्वयं के लिए प्रशंसा की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। यदि व्यक्ति प्रशंसा का अभ्यासी बन जाता है तो वह कर्मयोगी स्थिति में स्थिर नहीं रह पाता।
मंजू दीदी ने कहा कि करोड़ों आत्माओं में से भगवान ने हमें अपनी सेवा के लिए चुना है, यही सबसे बड़ा स्वमान है। उन्होंने सभी को कर्मयोगी बनने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यवहार और परमार्थ के बीच संतुलन बनाए रखना ही सच्चा आध्यात्मिक जीवन है।
कार्यक्रम के अंत में सभी को सद्गुरुवार का भोग वितरित किया गया।







