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कर्मों की गहन गति ही जीवन के सुख-दुख का आधार- ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा
*कर्मों की गहन गति ही जीवन के सुख-दुख का आधार- ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा*
गीता सप्ताह में ‘कर्म, अकर्म और विकर्म’ का गूढ़ रहस्य उजागर
बिलासपुर, टिकरापारा। ब्रह्माकुमारीज़ के प्रभु दर्शन भवन में आयोजित आठ दिवसीय ‘गीता सप्ताह’ के पांचवे दिन ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी जी ने “कर्मों की गहन गति” विषय पर सारगर्भित उद्बोधन दिया। उन्होंने बताया कि मनुष्य के जीवन में आने वाले सुख और दुःख उसके स्वयं के कर्मों का ही परिणाम होते हैं। आत्मा का वास्तविक श्रृंगार उसके श्रेष्ठ कर्म हैं, जिन्हें साधना और अभ्यास से विकसित किया जा सकता है।
*मन का स्वास्थ्य: स्वयं करें मूल्यांकन…*
दीदी ने कहा कि जैसे शरीर का तापमान मापने के लिए थर्मामीटर होता है, वैसे ही मन का भी स्वयं निरीक्षण आवश्यक है। छोटी-छोटी बातों में निराशा या क्रोध आना मन की कमजोरी का संकेत है। ऐसे में ‘ज्ञान रूपी आहार’ से मन को सशक्त बनाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि ब्रह्ममुहूर्त में उठकर परमात्मा का स्मरण करना ‘पांडव वृत्ति’ को जागृत करता है, जबकि आलस्य ‘कौरव वृत्ति’ को बढ़ावा देता है।
*तीन प्रकार के कर्मों की दी व्याख्या*
कार्यक्रम में कर्मों को तीन भागों में समझाया गया— सुकर्म: निस्वार्थ सेवा और कल्याणकारी कार्य, अकर्म: ईश्वर स्मृति में किए गए कर्म, जो बंधनमुक्त होते हैं और विकर्म: विकारों के प्रभाव में किए गए पाप कर्म
*कर्मफल से कोई नहीं बच सकता…*
भीष्म पितामह का उदाहरण देते हुए दीदी ने बताया कि अधर्म के समय मौन रहना भी पाप के समान है। द्रौपदी चीरहरण के समय उनकी निष्क्रियता का परिणाम उन्हें बाणों की शय्या के रूप में भुगतना पड़ा।
उन्होंने कहा कि ‘चित्रगुप्त’ कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि हमारी अंतरात्मा ही है, जो हर कर्म का लेखा-जोखा रखती है।
*कटु वाणी बन सकती है विनाश का कारण…*
दीदी ने वाणी संयम पर जोर देते हुए कहा कि एक कठोर शब्द भी बड़े विवाद और विनाश का कारण बन सकता है। मधुर वाणी ही संबंधों को सुदृढ़ बनाती है और शांति का मार्ग प्रशस्त करती है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को गुरुवार का भोग वितरित किया गया।
(मीडिया प्रभाग)
ब्रह्माकुमारीज़, टिकरापारा





