Brahma Kumaris Raj Kishore Nagar
गीता’ आत्मा को सशक्त बनाने वाला दिव्य आहार — ब्र.कु. शशिप्रभा
*‘गीता’ आत्मा को सशक्त बनाने वाला दिव्य आहार — ब्र.कु. शशिप्रभा*
चौथे दिन टिकरापारा में ‘आत्मानुभूति’ और ‘सात गुणों’ पर सारगर्भित चर्चा
बिलासपुर। टिकरापारा स्थित ब्रह्माकुमारीज़ के प्रभु दर्शन भवन में आयोजित आठ दिवसीय ‘गीता सप्ताह’ के अंतर्गत ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी ने आत्मा के वास्तविक स्वरूप और उसके मौलिक गुणों पर गहन एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकाश डाला। यह विशेष सत्र दिवंगत स्नेही एवं कर्मठ – सुशील भाई सगदेव की पावन स्मृति को समर्पित रहा।
*आत्मा का दिव्य आहार: सात गुणों की आवश्यकता*
दीदी ने समझाया कि जिस प्रकार शरीर को संचालित करने के लिए पाँच तत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—आवश्यक हैं, उसी प्रकार आत्मा के संतुलित और सुखी जीवन के लिए सात दिव्य गुण अनिवार्य हैं। ये गुण हैं—सुख, शांति, प्रेम, आनंद, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य बाहरी संसार में सुख-शांति की तलाश कर रहा है, जबकि ये सभी गुण आत्मा की आंतरिक आवश्यकताएं हैं, जिन्हें केवल राजयोग और परमात्म ज्ञान के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।
*‘मैं’ और ‘मेरा’ का वास्तविक बोध*
एक सरल अभ्यास के माध्यम से दीदी ने ‘स्व’ की पहचान कराते हुए बताया कि जब हम कहते हैं “मेरा शरीर”, “मेरा हाथ”, तो ‘मेरा’ कहने वाली सत्ता ‘मैं’ अर्थात आत्मा है, जो शरीर से भिन्न है। आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है—यह न जलती है, न कटती है और न ही नष्ट होती है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी शरीर रूपी वस्त्र बदलती है। इसलिए मृत्यु पर अत्यधिक शोक करना अज्ञान का परिणाम है।
*मिरर एक्सरसाइज: आत्मचेतना का अभ्यास*
दीदी ने ‘मिरर एक्सरसाइज’ का अभ्यास कराते हुए कहा कि जब भी हम आईने के सामने जाएं, तो केवल बाहरी रूप को न देखें, बल्कि यह अनुभव करें कि “मैं आत्मा, मस्तक के मध्य भृकुटी पर स्थित एक ज्योतिर्मय सितारा हूँ।” यही आत्मचेतना हमें आंतरिक शक्ति प्रदान करती है।
*महापुरुषों से प्रेरणा*
स्वामी विवेकानंद, गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी के उदाहरण देते हुए दीदी ने कहा कि ये महान आत्माएं ‘पूर्ण चार्ज बैटरी’ के समान थीं, जिनमें ये सभी सात गुण पूर्ण रूप से विद्यमान थे। इसी आत्मिक शक्ति के बल पर उन्होंने समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाए। यदि हम भी इन गुणों को अपने जीवन में धारण करें, तो हम अपने वातावरण और परिस्थितियों को बदलने में सक्षम बन सकते हैं।
*जागरूकता: ज्ञान को जीवन में उतारें*
प्रवचन के अंत में दीदी ने ‘जागृति’ अर्थात जागरूकता के महत्व पर बल देते हुए कहा कि ज्ञान केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए है। उन्होंने सभी को प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा आत्मचिंतन और परमात्म स्मृति में बिताने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम का समापन सामूहिक ध्यान के साथ हुआ, जिसमें उपस्थित सभी ने स्वयं को ‘ज्योति बिंदु’ स्वरूप में स्थित कर दिवंगत सुशील भाई की आत्मा की शांति और उनकी अगली यात्रा के लिए शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
— मीडिया प्रभाग, ब्रह्माकुमारीज़, टिकरापारा






